
भोपाल/छिंदवाड़ा: भारतीय राजनीति के पटल पर अक्सर ‘विकास’ और ‘सत्ता’ के बीच एक अजीब सा द्वंद्व देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम एक ऐसे ही अध्याय के रूप में दर्ज है, जहाँ उनके समर्थक ही नहीं बल्कि धुर विरोधी भी दबी जुबान में उनकी कार्यशैली और दूरदर्शिता का लोहा मानते हैं।
विकास की वह रफ्तार जिससे घबरा गई सियासत?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि कमलनाथ ने जिस ‘छिंदवाड़ा मॉडल’ को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई, उसे वे पूरे मध्य प्रदेश में लागू करने की तैयारी में थे। जानकार कहते हैं कि उनके शासनकाल के दौरान राज्य की आर्थिक और बुनियादी संरचना में जो बदलाव शुरू हुए थे, उन्होंने विपक्षी दलों की चिंता बढ़ा दी थी। क्या यही कारण था कि केंद्र और राज्य के बीच तालमेल में बाधाएं उत्पन्न की गईं? क्या बजट के आवंटन में कमी केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया थी या कोई सोची-पछी रणनीति?
सत्ता परिवर्तन: मजबूरी या महत्वाकांक्षा?
बीजेपी और अन्य दलों के कुछ नेताओं के बयानों को अगर गहराई से खंगाला जाए, तो एक चौंकाने वाली बात सामने आती है। दबी आवाजों में यह कहा जाता है कि यदि कमलनाथ को 5 साल का कार्यकाल मिल जाता, तो उनका ‘विकास कार्ड’ अन्य विचारधाराओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर देता।
यही वह बिंदु है जहाँ ‘खरीद-फरोख्त’ और ‘विधायकों के असंतोष’ की कहानियां जन्म लेती हैं। आलोचकों का तर्क है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार को गिराने के पीछे विकास की वह रफ़्तार थी जिसे रोकना विपक्ष के लिए राजनीतिक अस्तित्व बचाने की मजबूरी बन गया था।
दलबदलुओं की स्थिति: सम्मान या समझौता?
आज राजनीति में सबसे बड़ा सवाल उन विधायकों पर है जिन्होंने पाला बदला। आरोप लगते रहे हैं कि जिस उद्देश्य और ‘प्रलोभन’ के साथ उन्होंने अपनी मूल पार्टी छोड़ी, उन्हें वह सम्मान और स्थान नहीं मिला। राजनीति के जानकारों का कहना है कि जो नेता अपनी निष्ठा बेचते हैं, कालांतर में उनका राजनीतिक अस्तित्व खुद-ब-खुद बौना हो जाता है। आज वे सत्ता के सामने ‘नतमस्तक’ होने को मजबूर हैं, क्योंकि जनता की अदालत और दूसरी पार्टियों के द्वार उनके लिए बंद हो चुके हैं।
आज बात उस सच की, जो अक्सर राजभवन की फाइलों और चुनावी रैलियों के शोर में दबा दिया जाता है। बात मध्य प्रदेश की सियासत के उस ‘चाणक्य’ की, जिनके विकास पथ से विरोधियों के पसीने छूट गए थे।
छिंदवाड़ा का कोना-कोना कमलनाथ की दूरदर्शिता की गवाही देता है। लेकिन क्या यही विकास उनके मुख्यमंत्री पद का दुश्मन बन गया? क्या दिल्ली से लेकर भोपाल तक की घेराबंदी इसलिए की गई ताकि एक दूरदर्शी नेता को काम करने का मौका न मिले? बजट रोका गया, राहों में रोड़े अटकाए गए, फिर भी जब पहिया नहीं थमा… तो लोकतंत्र की मर्यादा को ‘मंडी’ में तब्दील कर दिया गया।
यह समाचार विश्लेषण समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमें ‘विकास’ करने वाले नेतृत्व की आवश्यकता है या ‘सत्ता’ बचाने वाले समीकरणों की। पत्रकारिता का काम आईना दिखाना है, और यह आईना आज मध्य प्रदेश की सियासत के सबसे कड़वे सच को उजागर कर रहा है।









