सत्ता के भूखे या पार्टी के भक्षक? जानिए कैसे रामखेलावन पटेल ने धनबल और जातिवाद से BJP-RSS की लुटिया डुबोई?

राजनीति में जब निष्ठा की जगह धनबल ले लेता है और विचारधारा की जगह जातिवाद हावी हो जाता है, तो संगठन की नींव हिलने लगती है। आज हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश बीजेपी के एक ऐसे ही बड़े चेहरे की, जिन्होंने पार्टी की साख को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हम बात कर रहे हैं पूर्व मंत्री रामखेलावन पटेल की।

सूत्रों के हवाले से जो बड़ा खुलासा हुआ है, वह बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के आंतरिक तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

एक समय था जब रामखेलावन पटेल दूसरी पार्टी से आकर बीजेपी में शामिल हुए थे। बीजेपी ने उन्हें न सिर्फ टिकट दिया, बल्कि मलाईदार मंत्री पद से भी नवाजा। लेकिन जब उनके जमीनी पैर उखड़ने लगे और वो चुनाव हारने की कगार पर पहुंच गए, तो बीजेपी आलाकमान उन्हें टिकट देने के मूड में नहीं था। लेकिन कहते हैं न कि आज की राजनीति में धनबल के दम पर कुछ भी मुमकिन है।

दावा किया जा रहा है कि चरम पर पहुंचे जातिवाद के आधार पर, संघ (RSS) के एक बड़े पदाधिकारी के संरक्षण के चलते रामखेलावन पटेल को दोबारा टिकट मिल गया। लेकिन जनता सब देख रही थी। बीजेपी की प्रचंड लहर के बावजूद, भारी-भरकम अंतर से रामखेलावन पटेल यह चुनाव हार गए।

आखिर जनता ने इन्हें क्यों नकारा? इसके पीछे मंत्री रहते हुए किए गए इनके कारनामे हैं। रामखेलावन पटेल पर आरोप है कि मंत्री रहते हुए उन्होंने सरकार में जमकर लूट मचाई। रेत के व्यापारियों को परेशान करना, उनसे अवैध हफ्ता वसूली करना इनकी राजनीति का हिस्सा बन गया था।

इतना ही नहीं, उन पर सबसे बड़ा आरोप यह लगा कि उन्होंने केवल अपनी (पटेल) जाति के लोगों को सपोर्ट किया और बाकी सभी जातियों के लोगों को न सिर्फ नजरअंदाज किया, बल्कि उन्हें बेइज्जत भी किया। सरकारी कामों में सिर्फ एक ही जाति के लोगों को ठेके और काम दिए गए, जिससे दूसरी जातियों में बीजेपी और संघ के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा हो गया। नतीजतन, चुनाव में जो पटेल वोट बैंक इनका एकाधिकार माना जाता था, वह भी चार हिस्सों में बंट गया और बाकी जातियों के वोटर्स ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। चुनाव हारने के बाद रामखेलावन पटेल का असली रंग सामने आया है। सत्ता और पद के भूखे इस नेता ने अब अपनी ही बीजेपी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। डॉ. मोहन यादव सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले टेंडरों पर ये धरने पर बैठ रहे हैं। खंडेलवाल जैसे बड़े संगठन मंत्रियों को अपने पैरों तले कुचलने की कोशिश कर रहे हैं।

यह साफ दिखाता है कि यह धरना जनता के लिए नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति है ताकि इन्हें हारने के बाद भी सरकार में कोई बड़ा पद या निगम-मंडल की कुर्सी मिल सके। अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए ये अपनी ही सरकार की धज्जियां उड़ाने पर आमादा हैं।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी और संघ इस दलबदलू और जातिवादी नेता की हरकतों को बर्दाश्त करते रहेंगे? क्या आगामी चुनावों में बीजेपी इन्हें फिर से टिकट देकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगी? क्योंकि जनता और जमीनी कार्यकर्ता अब यह साफ कर चुके हैं कि जो नेता पार्टी और संघ की लुटिया डुबोने में लगा हो, उसके लिए संगठन में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

ब्रांडवाणी समाचार के लिए ब्यूरो रिपोर्ट।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

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