
सार
अप्रैल 2026 को बिहार में शराबबंदी लागू हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने 2016 में शराब की बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। कानून के मुताबिक शराब का निर्माण, बिक्री, खरीद, भंडारण, परिवहन और सेवन प्रतिबंधित है। हालांकि, दस साल बाद भी अवैध शराब की बरामदगी और तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं।
विस्तार
बिहार में शराबबंदी की शुरुआत अप्रैल 2016 में हुई थी। सरकार का उद्देश्य शराब की वजह से होने वाली सामाजिक समस्याओं, घरेलू हिंसा और परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करना था। इसके बाद राज्य में शराब के निर्माण, बिक्री, खरीद, भंडारण, परिवहन और सेवन को कानूनन अपराध बना दिया गया। बिहार सरकार का आबकारी विभाग भी इसे Complete Prohibition के रूप में लागू करने की बात करता है।
कानूनी तौर पर इसका जवाब हां है। बिहार में सामान्य परिस्थितियों में शराब रखना, खरीदना, बेचना, बनाना या पीना प्रतिबंधित है। बिहार निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 में इसके उल्लंघन पर कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। कानून में अवैध शराब के निर्माण और बिक्री जैसे अपराधों के लिए कठोर सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
यानी बिहार उन राज्यों में शामिल है जहां शराब का सामान्य व्यावसायिक बाजार मौजूद नहीं है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि राज्य में शराब बिल्कुल उपलब्ध ही नहीं होती।
शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब की तस्करी और बिक्री को रोकना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2025 में बिहार में 36.3 लाख लीटर से अधिक शराब जब्त की गई और शराबबंदी कानून के उल्लंघन के आरोप में 1.25 लाख से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई।
जब्त शराब में भारतीय निर्मित विदेशी शराब के साथ देसी शराब भी शामिल थी। आंकड़े बताते हैं कि शराबबंदी के बावजूद अवैध नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
शराबबंदी का एक बड़ा आर्थिक प्रभाव राज्य के राजस्व पर पड़ा है। हाल में NCAER से जुड़े एक अध्ययन में कहा गया कि शराबबंदी से पहले शराब से मिलने वाला आबकारी राजस्व बिहार की अपनी आय का लगभग 14 प्रतिशत था। अध्ययन ने यह भी तर्क दिया कि शराबबंदी के बाद अवैध शराब की रोकथाम और निगरानी पर सरकार का खर्च बढ़ा।
हालांकि, शराबबंदी के सामाजिक प्रभाव को लेकर तस्वीर एकतरफा नहीं है। कुछ सर्वेक्षणों में महिलाओं और परिवारों की ओर से शराबबंदी को समर्थन मिलने तथा घरेलू आर्थिक स्थिति में सुधार जैसे सकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं।
शराबबंदी लागू करते समय महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा को रोकना प्रमुख उद्देश्यों में शामिल था। लेकिन दस साल बाद इस नीति के प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों के बीच बहस जारी है।
NCAER के 2026 के अध्ययन में कहा गया कि उपलब्ध आंकड़ों से शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में व्यापक कमी का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। वहीं, दूसरे सर्वेक्षणों में महिलाओं ने शराबबंदी के कारण परिवार और घरेलू माहौल में सकारात्मक बदलाव महसूस होने की बात कही है।
बिहार में कानूनी तौर पर शराबबंदी अब भी लागू है, लेकिन जमीनी स्तर पर अवैध शराब की उपलब्धता, तस्करी और बरामदगी के मामले लगातार चुनौती बने हुए हैं। एक तरफ सरकार कानून को लागू करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है, तो दूसरी तरफ शराबबंदी से होने वाले राजस्व नुकसान और इसके सामाजिक परिणामों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
इसलिए दस साल बाद बिहार की शराबबंदी की तस्वीर को सिर्फ “शराब पूरी तरह बंद है” या “शराब आसानी से मिलती है” जैसे दो वाक्यों में समझना मुश्किल है। कानून के स्तर पर पूर्ण प्रतिबंध है, लेकिन उसकी प्रभावी निगरानी और अवैध कारोबार पर नियंत्रण आज भी सबसे बड़ी चुनौती है।
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