
खजुराहो/ परशुराम रैकवार: विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के पश्चिमी समूह मंदिर परिसर में वाहनों की पार्किंग को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। पर्यटकों के वाहनों को प्रवेश मार्ग पर रोककर उन्हें आगे पैदल या ई-रिक्शा से जाने की व्यवस्था के बीच उसी प्रतिबंधित मार्ग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से जुड़े अधिकारियों के वाहन खड़े होने की बात सामने आई है। इससे पर्यटकों के लिए लागू नियमों और अधिकारियों के लिए कथित तौर पर अलग व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
पर्यटकों के वाहनों को प्रवेश द्वार पर रोकने की व्यवस्था
खजुराहो के पश्चिमी समूह मंदिर देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं। यहां रोजाना बड़ी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। जानकारी के मुताबिक, पर्यटकों के निजी वाहनों को प्रवेश मार्ग के पहले गेट पर ही रोक दिया जाता है। इसके बाद उन्हें करीब 100 मीटर की दूरी तक पैदल या ई-रिक्शा के माध्यम से आगे जाना पड़ता है।
व्यवस्था का उद्देश्य मंदिर परिसर के आसपास वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करना और ऐतिहासिक धरोहर क्षेत्र को सुरक्षित रखना बताया जाता है। हालांकि, इसी व्यवस्था के बीच अधिकारियों के वाहनों के प्रतिबंधित मार्ग तक पहुंचने और वहां खड़े होने की तस्वीरें सामने आने से सवाल उठ रहे हैं।
जिस रास्ते पर पर्यटकों को रोकते हैं, वहीं अधिकारियों की गाड़ियां?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर आम पर्यटकों के वाहनों को पहले प्रवेश द्वार पर रोकने का नियम है, तो ASI से जुड़े अधिकारियों के वाहन उसी मार्ग पर कैसे पहुंच रहे हैं?
पर्यटकों का कहना है कि जब आम लोगों को अपने वाहन निर्धारित पार्किंग क्षेत्र में छोड़कर आगे जाना पड़ता है, तो अधिकारियों के वाहनों को प्रवेश मार्ग के भीतर तक पहुंचने की अनुमति क्यों दी जा रही है। यदि अधिकारियों के वाहनों को किसी विशेष परिस्थिति या आधिकारिक कार्य के कारण वहां तक जाने की अनुमति है, तो इसकी स्पष्ट जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
क्या नियम सभी के लिए समान हैं?
विश्व धरोहर स्थल होने के कारण खजुराहो में सुरक्षा और संरक्षण से जुड़े नियमों का पालन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित है, तो वहां सभी के लिए नियम समान होने चाहिए।
वहीं, यदि ASI अधिकारियों या कर्मचारियों के वाहनों के लिए अलग व्यवस्था निर्धारित है, तो उसके नियम और आधार स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। इससे पर्यटकों के बीच पैदा हो रहे भ्रम को भी दूर किया जा सकता है।
पर्यटक सुविधा और व्यवस्था पर भी उठे सवाल
पर्यटकों को करीब 100 मीटर पैदल चलने या ई-रिक्शा का सहारा लेने की व्यवस्था अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है, यदि इसका उद्देश्य धरोहर क्षेत्र को वाहनों से सुरक्षित रखना है। लेकिन जब उसी स्थान पर कुछ चुनिंदा वाहनों की आवाजाही दिखाई देती है तो व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
खजुराहो जैसे विश्व धरोहर स्थल पर देशी-विदेशी पर्यटकों के अनुभव और सुविधा का विशेष महत्व है। ऐसे में नियमों के पालन के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि पर्यटकों को यह स्पष्ट दिखाई दे कि प्रतिबंध सभी पर समान रूप से लागू हैं।
ASI से मांगा जा रहा स्पष्ट जवाब
इस पूरे मामले में ASI, खजुराहो की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है। सवाल यह है कि पश्चिमी समूह मंदिर के प्रवेश मार्ग पर अधिकारियों के वाहनों को खड़ा करने की अनुमति किस आधार पर दी गई है? क्या इन वाहनों के लिए कोई आधिकारिक अनुमति या विशेष प्रावधान है? यदि अनुमति है तो उसका आधार क्या है और यदि अनुमति नहीं है तो प्रतिबंधित क्षेत्र में वाहन खड़े करने वालों पर क्या कार्रवाई की गई?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही तस्वीर साफ हो सकेगी कि मामला नियमों के उल्लंघन का है या अधिकारियों के वाहनों के लिए निर्धारित किसी आधिकारिक व्यवस्था का।
विश्व धरोहर की गरिमा से जुड़ा मामला
खजुराहो केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यहां व्यवस्थाओं को लेकर उठने वाले छोटे से छोटे सवाल का भी पारदर्शी तरीके से जवाब दिया जाना जरूरी है।
पर्यटकों के लिए नियम लागू करने वाली संस्था के अधिकारियों पर भी उन्हीं नियमों की जिम्मेदारी होती है। इसलिए सवाल सिर्फ वाहनों की पार्किंग का नहीं, बल्कि व्यवस्था में समानता और पारदर्शिता का है। अब देखना होगा कि ASI खजुराहो इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या प्रतिबंधित मार्ग पर खड़े वाहनों के संबंध में कोई कार्रवाई होती है।
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