
आशा भोसले की आवाज में रिकॉर्ड हुआ ‘दम मारो दम’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित गानों में गिना जाता है। 1971 की फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा के इस गाने को खास अंदाज देने के लिए आशा भोसले ने कथित तौर पर गाते समय कुछ देर सांस रोककर आवाज में भारीपन और नशे जैसा प्रभाव पैदा किया था। गाना जबरदस्त हिट हुआ और 1972 में रेडियो सीलोन के बिनाका गीतमाला पर 12 हफ्तों तक नंबर-1 रहा। हालांकि, नशे को बढ़ावा देने के आरोपों के चलते इसे ऑल इंडिया रेडियो पर प्रतिबंध का सामना करना पड़ा।
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं, जो रिलीज के दशकों बाद भी अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं। आशा भोसले की आवाज में गाया गया ‘दम मारो दम’ भी ऐसा ही गीत है। आर.डी. बर्मन के संगीत और आनंद बख्शी के बोल से सजा यह गाना 1971 में रिलीज हुई देव आनंद की फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा का हिस्सा था। गाने को जीनत अमान पर फिल्माया गया था और इसके संगीत तथा प्रस्तुति ने उस दौर में काफी चर्चा बटोरी।
आवाज में नशे का असर लाने की कोशिश
इस गाने की रिकॉर्डिंग से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी सामने आता है। रिपोर्ट के मुताबिक, आर.डी. बर्मन ऐसी आवाज चाहते थे, जिसमें किरदार के अनुरूप एक खास तरह का भारीपन और नशीला अंदाज महसूस हो। आशा भोसले ने इस जरूरत को समझते हुए गाते समय कुछ देर सांस रोककर आवाज को वैसा प्रभाव देने की कोशिश की। यही प्रयोग गाने की प्रस्तुति का खास हिस्सा बन गया।
गाने की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिलीज के बाद यह तेजी से श्रोताओं की पसंद बन गया। 1972 में रेडियो सीलोन के लोकप्रिय कार्यक्रम बिनाका गीतमाला में यह लंबे समय तक शीर्ष पर रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 12 हफ्तों तक नंबर-1 रहने के कारण इसे ‘सरताज गीत’ की पहचान भी मिली।
सुपरहिट होने के बावजूद रेडियो पर लगा प्रतिबंध
एक तरफ ‘दम मारो दम’ लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ इसके बोल और फिल्मांकन को लेकर विवाद भी खड़ा हुआ। गाने में नशे और हिप्पी संस्कृति की झलक को लेकर आपत्तियां सामने आईं। इसके बाद ऑल इंडिया रेडियो ने गाने को प्रसारित करने पर रोक लगा दी। बाद में दूरदर्शन पर फिल्म के प्रसारण के दौरान भी इस गाने को काटे जाने की बात सामने आई।
दिलचस्प बात यह रही कि जिस गीत को भारत में रेडियो प्रसारण के प्रतिबंध का सामना करना पड़ा, वही रेडियो सीलोन पर लगातार लोकप्रिय बना रहा। यही वजह है कि ‘दम मारो दम’ की कहानी सिर्फ एक फिल्मी गाने की सफलता की कहानी नहीं रही, बल्कि यह उस दौर के संगीत, बदलती युवा संस्कृति और सेंसरशिप से जुड़ा चर्चित प्रसंग भी बन गई।
देव आनंद भी हटाना चाहते थे गाना
इस गीत से जुड़ा एक और किस्सा भी काफी चर्चित है। रिपोर्टों के अनुसार, फिल्म के निर्देशक और अभिनेता देव आनंद शुरुआत में गाने को लेकर चिंतित थे और इसे फिल्म से हटाने पर विचार कर रहे थे। आशा भोसले ने कथित तौर पर गाने को फिल्म में बनाए रखने का आग्रह किया। आखिरकार यह गीत फिल्म का हिस्सा बना और बाद में इसकी लोकप्रियता ने इसे यादगार बना दिया।
आज ‘दम मारो दम’ को 1970 के दशक के उन गीतों में गिना जाता है, जिन्होंने हिंदी फिल्म संगीत की प्रस्तुति को एक अलग दिशा दी। आशा भोसले की आवाज, आर.डी. बर्मन का प्रयोगधर्मी संगीत और जीनत अमान की स्क्रीन प्रस्तुति ने इसे ऐसा गीत बना दिया, जिसे विवादों के बावजूद लोग लंबे समय तक याद करते रहे।
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