‘बायकाट चाइना’ सिर्फ चुनावी झुनझुना? स्वदेशी के दावों के बीच ड्रैगन की गिरफ्त में भारतीय बाजार, जानिए आत्मनिर्भरता का कड़वा सच!

“बहिष्कार”, “आत्मनिर्भर भारत” और “चीनी सामान का पूरी तरह बायकाट”—ये वो भारी-भरकम शब्द हैं जो पिछले कुछ सालों से देश के हर नुक्कड़, सोशल मीडिया और राजनीतिक भाषणों में सबसे ज्यादा गूंज रहे हैं। लेकिन क्या नारों की इस चमकीली परत के पीछे का कड़वा सच देश को पता है? ब्रांडवाणी समाचार आज इसी देशभक्ति के नाम पर बेचे जा रहे भ्रम का एक ऐसा तीखा विश्लेषण आपके सामने लाया है, जिसे सुनकर हुक्मरानों के माथे पर पसीना आ जाएगा।

दरअसल, जमीनी हकीकत यह है कि देश को ‘स्वदेशी’ का पाठ पढ़ाने वाली नीतियां और दावे पूरी तरह से खोखले साबित हो रहे हैं। एक तरफ जहां सीमा पर तनाव और चीनी ऐप्स पर पाबंदी लगाकर जनता के बीच यह माहौल बनाया गया कि हमने चीन की आर्थिक कमर तोड़ दी है, वहीं दूसरी तरफ आधिकारिक व्यापारिक आंकड़े कुछ और ही खौफनाक कहानी बयां कर रहे हैं।

आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि ‘बायकाट’ के शोर के बीच भारत का चीन से आयात कम होने के बजाय रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ चुका है। आज हमारी मोबाइल इंडस्ट्री, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाओं के कच्चे माल (API), सौर ऊर्जा पैनल और यहां तक कि भारी मशीनरी तक के लिए भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है। अगर आज चीन हाथ खींच ले, तो हमारे कई घरेलू उद्योग पूरी तरह से ठप हो जाएंगे।

सवाल जो पूछे जाने जरूरी हैं…

नारेबाजी बनाम नीति: क्या चीनी ऐप्स को बैन कर देना ही हमारी आर्थिक रणनीति थी? अगर हां, तो जिन बुनियादी सामानों के बिना हमारे उद्योग नहीं चल सकते, उनका निर्माण पिछले कई सालों में भारत में बड़े पैमाने पर क्यों नहीं शुरू हो पाया?

स्वदेशी फैक्ट्रियों का सच: क्या ‘मेड इन इंडिया’ के नाम पर हम केवल चीन से पुर्जे (Parts) मंगवाकर भारत में सिर्फ उनकी असेंबलिंग (स्क्रू-ड्राइवर इंडस्ट्री) कर रहे हैं? असली मैन्युफैक्चरिंग भारत में क्यों नहीं हो पा रही है?

जनता से छल क्यों?: जब व्यापारिक रिश्तों में भारत की निर्भरता चीन पर लगातार गहरी होती जा रही है, तो जनता के सामने इसे ‘आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह पेश क्यों किया जाता है?

खोखली नारेबाजी से कभी कोई देश आर्थिक महाशक्ति नहीं बनता। अगर सच में चीन को मात देनी है, तो हमें व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘बायकाट’ अभियानों से बाहर निकलकर अपनी जमीन पर वास्तविक रिसर्च, इंफ्रास्ट्रक्चर और भारी उद्योगों को मजबूत करना होगा। जब तक हमारी फैक्ट्रियों की नींव में चीनी कच्चा माल रहेगा, तब तक आत्मनिर्भरता का हर दावा महज एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा।

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