
सार
भगवान श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप यानी विश्वरूप भारतीय धार्मिक परंपरा में सबसे अद्भुत प्रसंगों में से एक माना जाता है। जब भी श्रीकृष्ण के विराट रूप की बात होती है, सबसे पहले कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को दिए गए विश्वरूप दर्शन का स्मरण होता है। भगवद्गीता के 11वें अध्याय में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। हालांकि, धार्मिक कथाओं में ऐसे कई प्रसंग बताए गए हैं, जब श्रीकृष्ण ने अलग-अलग पात्रों को अपनी दिव्य सत्ता का अनुभव कराया।
विस्तार
महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन अपने ही रिश्तेदारों और गुरुजनों को सामने देखकर मोह और दुविधा में पड़ गए थे। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म, आत्मा और धर्म का ज्ञान दिया।
अर्जुन ने जब भगवान से उनके वास्तविक स्वरूप को देखने की इच्छा जताई, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की। इसके बाद अर्जुन ने भगवान के विराट स्वरूप में संपूर्ण चराचर जगत को समाया हुआ देखा।
अर्जुन ने भगवान के शरीर में देवताओं, ऋषियों, ब्रह्मा, महादेव और असंख्य प्राणियों को देखा। उन्हें भगवान का आदि, मध्य और अंत दिखाई नहीं दिया। यह प्रसंग भगवद्गीता के विश्वरूप दर्शन योग के रूप में प्रसिद्ध है।
श्रीकृष्ण के बाल रूप से जुड़ा माता यशोदा का प्रसंग भी बेहद अद्भुत है। कथा के अनुसार एक बार बालकृष्ण के मिट्टी खाने की शिकायत यशोदा मैया से की गई। जब उन्होंने कृष्ण से मुंह खोलने को कहा, तो बालकृष्ण ने अपना मुंह खोल दिया।
यशोदा ने कृष्ण के मुख के भीतर केवल मिट्टी नहीं, बल्कि पूरा ब्रह्मांड देखा। उन्हें आकाश, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र और अनेक लोकों के दर्शन हुए। यहां तक कि उन्हें उस दृश्य में स्वयं का भी दर्शन हुआ।
इसके बावजूद उनकी ममता कम नहीं हुई। उनके लिए कृष्ण उस समय भी उनके नटखट बालक ही रहे। यही प्रसंग कृष्ण की बाल लीलाओं में सबसे रहस्यमयी घटनाओं में गिना जाता है।
महाभारत में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग हस्तिनापुर की राजसभा से जुड़ा है। युद्ध रोकने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे थे। उन्होंने पांडवों के लिए उचित अधिकार देने की बात रखी, लेकिन दुर्योधन इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
कथाओं के अनुसार दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया। तब भगवान ने अपना दिव्य और विराट स्वरूप प्रकट किया। उनके इस स्वरूप को देखकर सभा में मौजूद लोग स्तब्ध रह गए।
इस प्रसंग का उद्देश्य यह दिखाना था कि श्रीकृष्ण को सामान्य मनुष्य समझना और उन्हें अपने बल से नियंत्रित करने की कोशिश करना दुर्योधन की बड़ी भूल थी।
महाभारत में संजय का नाम भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वे स्वयं कुरुक्षेत्र में मौजूद नहीं थे, लेकिन महर्षि वेदव्यास की कृपा से उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी।
इसी दिव्य दृष्टि के माध्यम से संजय ने धृतराष्ट्र को युद्धभूमि की घटनाओं का वर्णन किया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिखाए गए विश्वरूप का भी वर्णन धृतराष्ट्र के सामने किया।
इसलिए विश्वरूप दर्शन के प्रसंग में अर्जुन के साथ संजय का उल्लेख भी विशेष रूप से किया जाता है।
श्रीकृष्ण का विराट रूप केवल एक अद्भुत दृश्य के रूप में नहीं देखा जाता। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी माना जाता है। इसमें यह संदेश मिलता है कि संपूर्ण सृष्टि एक ही परम सत्ता में समाहित है।
अर्जुन को जब विराट रूप दिखाई देता है तो उन्हें समझ आता है कि जीवन और मृत्यु केवल व्यक्तिगत घटनाएं नहीं हैं। मनुष्य को अपने कर्म और धर्म के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
भगवद्गीता के विश्वरूप दर्शन में भगवान का स्वरूप अनंत बताया गया है। उसमें असंख्य रूप, मुख, नेत्र और दिव्य शक्तियां दिखाई देती हैं।
श्रीकृष्ण की लीलाओं में एक ओर उनका बाल रूप है, जहां वे यशोदा के सामने नटखट कान्हा बने दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर अर्जुन के सामने वही कृष्ण अनंत ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए विराट रूप में प्रकट होते हैं।
यही विरोधाभास श्रीकृष्ण के चरित्र को धार्मिक परंपरा में इतना रहस्यमयी और आकर्षक बनाता है। भक्त के भाव के अनुसार भगवान कभी बालक बनकर सामने आते हैं तो कभी संपूर्ण सृष्टि के स्वामी के रूप में अपना दिव्य स्वरूप प्रकट करते हैं।
इसलिए श्रीकृष्ण के विराट रूप की कथा केवल महाभारत के युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी विभिन्न लीलाओं और भक्तों के अनुभवों में भी इसका अलग-अलग रूप दिखाई देता है।
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