
भारतीय दंड संहिता (IPC) में जिस अपराध को ‘लूट’ कहा जाता था, उसे नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) में ‘झपटमारी’ की श्रेणी में रखा गया है। इस बदलाव के बाद अपराध के आंकड़ों में बड़ा उछाल देखने को मिला है। पहले जो घटनाएं लूट की श्रेणी में दर्ज होती थीं, अब झपटमारी के तौर पर गिनी जा रही हैं। नतीजतन, पुलिस रिकॉर्ड में झपटमारी के मामलों की संख्या लगभग दो गुना बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल शब्दों का नहीं, बल्कि अपराध की परिभाषा और उसकी कानूनी व्याख्या में भी बड़ा अंतर पैदा करता है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पहले लूट की परिभाषा अपेक्षाकृत सीमित थी और इसमें केवल उन मामलों को शामिल किया जाता था जहां हिंसा या गंभीर धमकी के साथ संपत्ति छीनी जाती थी। लेकिन बीएनएस में झपटमारी की परिभाषा को व्यापक किया गया है। इसमें सड़क पर अचानक मोबाइल, पर्स या चेन छीनने जैसी घटनाएं भी शामिल हो गई हैं। इस वजह से अब छोटी-छोटी वारदातें भी गंभीर अपराध की श्रेणी में दर्ज हो रही हैं। इससे अपराध के आंकड़े बढ़े हुए दिखाई दे रहे हैं, जबकि असल में यह बदलाव कानूनी वर्गीकरण का परिणाम है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया पर भी असर पड़ेगा। झपटमारी के मामलों में अब सख्त धाराएं लागू होंगी, जिससे अपराधियों पर तेजी से कार्रवाई संभव होगी। हालांकि, कुछ आलोचकों का तर्क है कि इससे अपराध के आंकड़े अचानक बढ़ जाने से आम जनता में भय का माहौल बन सकता है। प्रशासन का कहना है कि यह बदलाव अपराध की गंभीरता को स्पष्ट करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए किया गया है।

