भ्रष्टाचार बनाम नियम का जाल: विकास की बलि चढ़ती मध्यप्रदेश की जनता और व्यापारी ?

अधिकारी चाहे ‘ईमानदार‘ हों या ‘भ्रष्ट‘, पिस रही है जनता; नियमों की आड़ में विकास पर लगा ब्रेक

भोपाल। मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है। मुख्य सचिव अनुराग जैन के हालिया संदर्भों और मुख्यमंत्री की मंशा के बीच एक कड़वी सच्चाई उभर कर सामने आई है। प्रदेश में यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि व्यवस्था दो पाटों के बीच फंसी है—एक तरफ वह वर्ग है जो बिना ‘सुविधा शुल्क‘ के फाइल आगे नहीं बढ़ाता, और दूसरी तरफ वे अधिकारी हैं जो ‘ईमानदारी‘ का चोला ओढ़कर नियमों की ऐसी पेचीदगियों में उलझे हैं कि काम होना ही बंद हो गया है।

ईमानदारी या कार्यहीनता?

 प्रदेश के व्यापारियों और आम नागरिकों का दर्द यह है कि भ्रष्टाचार तो एक समस्या थी ही, लेकिन अब ‘नियमों की आड़‘ में काम रोकना सबसे आसान तरीका बन गया है। एक ईमानदार अधिकारी यदि नियमों का हवाला देकर महीनों तक फाइलों को दबाए रखता है, तो क्या उसे वास्तव में जनहितकारी माना जा सकता है? विकास के लिए गति अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में ‘ईमानदारी का ढिंढोरा‘ अक्सर निर्णय न लेने की अक्षमता को छिपाने का ढाल बन गया है।

व्यापारी वर्ग बेहाल, थम गई विकास की रफ्तार

मध्यप्रदेश के आर्थिक विकास की रीढ़ माने जाने वाले व्यापारी आज प्रशासनिक उदासीनता का शिकार हैं। सिस्टम में सहयोग के बजाय अड़ंगेबाजी की संस्कृति पनप रही है। जानकारों का कहना है कि सिर्फ स्वच्छ छवि का होना पर्याप्त नहीं है; एक अधिकारी की असली सफलता इस बात में है कि वह नियमों के दायरे में रहकर जनता और व्यापारियों के काम को कितनी सुगमता और गति से पूरा करता है।

व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत

मध्यप्रदेश को केवल ‘नियमों के रक्षकों‘ की नहीं, बल्कि ‘समाधान देने वाले अधिकारियों‘ की आवश्यकता है। यदि नियम विकास में बाधा बन रहे हैं, तो उनमें सुधार होना चाहिए। भ्रष्टाचार और कार्यहीनता (Inaction) दोनों ही प्रदेश के भविष्य के लिए घातक हैं। जब तक अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होकर काम को गति नहीं देंगे, तब तक विकास की बातें केवल कागजी ही रहेंगी।

  • gaurav singh rajput

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