
मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। आय के सीमित स्रोत और बढ़ते खर्च के बीच नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषदें वित्तीय दबाव में हैं। स्थिति यह है कि कई निकायों के पास न तो कर्मचारियों का वेतन देने के लिए पर्याप्त धन है और न ही विकास कार्यों के लिए जरूरी संसाधन।
स्थानीय निधि संपरीक्षा की रिपोर्ट में सामने आया है कि नगरीय निकायों को अनुमानित आय से 50 प्रतिशत तक कम राशि प्राप्त हुई। बजट बनाते समय आय का आकलन यथार्थ से अधिक किया गया, जबकि वास्तविक वसूली लक्ष्य से काफी पीछे रही। इसका सीधा असर शहरी विकास परियोजनाओं और बुनियादी सेवाओं पर पड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई नगर निगमों और नगरपालिकाओं में संपत्ति कर, विकास शुल्क और शिक्षा उपकर की वसूली बेहद कम रही। कुछ निकायों में 20 से 30 प्रतिशत तक भी लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया। इससे यह साफ होता है कि कर संग्रह प्रणाली कमजोर है और निगरानी तंत्र प्रभावी नहीं है।
आय की कमी के चलते नगरीय निकायों का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वेतन, रखरखाव और प्रशासनिक खर्चों के बाद विकास कार्यों के लिए धन लगभग नहीं बचता। कई मामलों में राज्य सरकार को अतिरिक्त सहायता देनी पड़ रही है, जिससे शासन पर भी वित्तीय दबाव बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नगरीय निकायों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है, तो वसूली व्यवस्था में सुधार, यथार्थपरक बजट और सख़्त निगरानी आवश्यक है। अन्यथा “आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया” की स्थिति बनी रहेगी और शहरी विकास की रफ्तार प्रभावित होती रहेगी।

