लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक नया उबाल देखने को मिल रहा है, जिसने प्रदेश की राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब लोकतंत्र में अपनी जाति और समाज के उत्थान के लिए एकत्र होना भी किसी “विशेष अनुमति” के दायरे में आएगा? हाल ही में ब्राह्मण विधायकों और नेताओं की एक बैठक को लेकर प्रदेश अध्यक्ष के कड़े रुख ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है, जिसे लेकर ब्राह्मण समाज में भारी आक्रोश व्याप्त है।
स्वाभिमान पर चोट या अनुशासन का बहाना?
सूत्रों के अनुसार, ब्राह्मण विधायकों की आपसी चर्चा और समाज के मुद्दों पर एकजुट होने की कवायद को प्रदेश नेतृत्व ने जिस नजरिए से देखा है, उसे समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने ‘अपमान‘ की संज्ञा दी है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या अन्य वर्गों के सम्मेलनों और बैठकों पर भी इसी तरह की बंदिशें हैं? या फिर यह निशाना केवल ब्राह्मण समाज की एकता को खंडित करने के लिए साधा जा रहा है?
समाज के मन में सुलगते तीखे सवाल:
1. स्वतंत्रता पर अंकुश क्यों?: क्या एक विधायक को अपने समाज की पीड़ा सुनने और साझा करने के लिए भी प्रदेश अध्यक्ष से लिखित अनुमति लेनी होगी?
2. जातिगत भेदभाव का आरोप: क्या ब्राह्मण समाज की एकजुटता से नेतृत्व को असुरक्षा महसूस हो रही है? क्या यह किसी खास प्रकार की ‘नफरती राजनीति‘ का बीज बोने की कोशिश है?
3. क्या ब्राह्मण नेता ‘अछूत‘ हैं?: राजनीति के इस दौर में जहाँ हर वर्ग को लामबंद होने की आजादी है, वहां ब्राह्मणों की आवाज दबाने की कोशिश क्यों की जा रही है?
गहराता जन-आक्रोश
ब्राह्मण समाज के विचारकों का स्पष्ट कहना है कि ब्राह्मणों ने हमेशा सर्वसमाज को दिशा दी है, लेकिन आज उन्हीं की राजनीतिक स्वतंत्रता को बेड़ियों में जकड़ने का प्रयास हो रहा है। यदि समाज के प्रतिनिधि ही आपस में संवाद नहीं कर पाएंगे, तो वे समाज की समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे?
प्रदश अध्यक्ष के इस “अघोषित फरमान” को ब्राह्मण विरोधी मानसिकता से जोड़कर देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि यह राजनीति नहीं, बल्कि एक वर्ग विशेष की पहचान मिटाने का षड्यंत्र है। आने वाले समय में यह गुस्सा क्या रंग लाएगा और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग इसका क्या जवाब देंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है— ब्राह्मण समाज का यह मौन भविष्य के किसी बड़े राजनीतिक तूफान की आहट है।
“जिस समाज ने राष्ट्र को शास्त्र और शस्त्र दोनों दिए, आज उसे अपनी आवाज उठाने के लिए अनुमति की आवश्यकता पड़ रही है। यह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही का नया चेहरा है।” — समाज के आक्रोशित बुद्धिजीवियों का स्वर।

