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क्या हम वास्तव में उस वैज्ञानिक चेतना के सशक्तिकरण के लिए तैयार हैं, जिसके बिना 21वीं सदी की प्रतिस्पर्धी दुनिया में किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व सुरक्षित नहीं रह सकता ?

 यह प्रश्न केवल वैज्ञानिक समुदाय से ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सामूहिक चेतना से पूछा जाना चाहिए।

आज विज्ञान और प्रयोग केवल अनुसंधान के विषय भर नहीं रह गए हैं; वे राष्ट्र की नीति-निर्माण प्रक्रिया के केंद्रीय तत्व बन चुके हैं। विश्व के विकसित राष्ट्र विज्ञान को अपनी राजनीतिक, आर्थिक और समृद्धि-केंद्रित नीतियों की आधारशिला बना चुके हैं। ऐसे में भारत के लिए यह अनिवार्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपने राष्ट्रीय चरित्र का अभिन्न हिस्सा बनाए; अन्यथा विकास केवल काग़ज़ों तक सीमित रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं।

हम ऐसे युग के द्वार पर खड़े हैं जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमारी सोच को चुनौती दे रही है; जलवायु परिवर्तन हमारी जीवन-शैली को बदल रहा है; जैव-प्रौद्योगिकी स्वास्थ्य परिदृश्य को नए युग में ले जा रही है; और अंतरिक्ष अनुसंधान हमारी सीमाओं को अनंत बना रहा है। इन तीव्र वैश्विक परिवर्तनों के बीच यह आवश्यक हो जाता है कि विज्ञान को हम केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र-नीति के रूप में देखें।

भारतीय समाज में वैज्ञानिक चेतना के विस्तार के लिए सबसे पहले शिक्षा प्रणाली में गहन परिवर्तन की आवश्यकता है। विद्यार्थी केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि प्रश्न पूछना सीखें, तर्क करना सीखें और अन्वेषण की प्रक्रिया को समझें। जब बच्चे “क्यों” पूछना बंद कर देते हैं, तब समाज का विकास ठहर जाता है। इसलिए विद्यालय स्तर से ही वैज्ञानिक जिज्ञासा को प्रोत्साहन देना समय की मांग है।

विज्ञान का उद्देश्य समाज को सुविधा प्रदान करना है; किंतु समाज का दायित्व भी है कि वह विज्ञान को सही दिशा दे। दुर्भाग्यवश, आज अनुसंधान और समाज के बीच एक अदृश्य खाई मौजूद है। हमारे वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में अद्भुत शोध हो रहे हैं, परंतु उनका बड़ा हिस्सा जनता तक नहीं पहुँच पाता। यह स्थिति न केवल वैज्ञानिक क्षमता को सीमित करती है, बल्कि नवाचार की प्रक्रिया को भी अवरुद्ध करती है।

सौम्या विज्ञान एवं अनुसंधान फाउंडेशन इसी दूरी को कम करने के उद्देश्य से कार्य करता है। हमारा लक्ष्य ऐसी ज्ञान-संस्कृति का निर्माण करना है, जिसमें वैज्ञानिक शोध केवल संस्थाओं की उपलब्धि न बनकर समाज का साझा संसाधन बने। इसके लिए आवश्यक है कि—
• वैज्ञानिक संस्थान उद्योग से जुड़ें,
• उद्योग नवाचार को बढ़ावा दें, और
• सरकार वैज्ञानिक नीतियों को प्राथमिकता दे।

जब ये तीन स्तंभ—विज्ञान, उद्योग और शासन—एक साथ कार्य करते हैं, तभी भारत वैश्विक नेतृत्व की दिशा में वास्तविक, टिकाऊ और प्रभावशाली कदम रख सकता है।

आज ऊर्जा संकट, प्रदूषण, डेटा सुरक्षा, स्वास्थ्य संकट और खाद्य असुरक्षा जैसे मुद्दे केवल चुनौतियाँ नहीं हैं; वे चेतावनियाँ हैं कि यदि विज्ञान-आधारित नीतियाँ नहीं बनाई गईं, तो भविष्य और अधिक कठिन होगा। इन समस्याओं का समाधान भावनात्मक निर्णयों से नहीं, बल्कि प्रमाण-आधारित वैज्ञानिक नीतियों से ही संभव है।

प्रश्न यह है—
क्या हमारा समाज विज्ञान को विवाद का विषय बनाने के बजाय समाधान का साधन मानने के लिए तैयार है?
क्या हम शोध को विलासिता नहीं, बल्कि अनिवार्यता समझते हैं?
और क्या हम नवाचार को जोखिम नहीं, बल्कि अवसर मानने का साहस रखते हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर न केवल हमारे विज्ञान का भविष्य तय करेंगे, बल्कि हमारे राष्ट्र की दिशा भी निर्धारित करेंगे।

भारत के पास अपार युवा प्रतिभा है—और यही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि हम इस युवा ऊर्जा को वैज्ञानिक मार्गदर्शन, अनुसंधान के अवसर और नवाचार के मंच प्रदान करें, तो भारत का वैज्ञानिक भविष्य न केवल उज्ज्वल होगा, बल्कि वह वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी उभरेगा।

अब समय आ गया है कि विज्ञान को हम प्राथमिकता बनाएँ—
केवल भाषणों में नहीं, बल्कि नीतियों, संस्थाओं, उद्योगों और सामाजिक व्यवहार में भी।
क्योंकि विज्ञान ही वह प्रकाश है जो अज्ञानता के अंधकार को मिटाता है;
विज्ञान ही वह शक्ति है जो राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाती है;
और विज्ञान ही वह दृष्टि है जो भविष्य को केवल देखती नहीं, बल्कि उसका निर्माण भी करती है


— रवि कार्तिकेय दुबे
(निर्देशक)
(सौम्या विज्ञान एवं अनुसंधान फाउंडेशन)

gaurav
Author: gaurav

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