
यह ग़ज़ल शकील जमाली साहब की उस रचनात्मक परिपक्वता का प्रमाण है, जहाँ ज़िंदगी के कड़वे यथार्थ को वे बेहद सधे हुए, शालीन और गहरे शेरों में पिरो देते हैं। एक पत्रकार और साहित्य-प्रेमी के नाते इस ग़ज़ल को पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि यह सिर्फ़ शायरी नहीं, बल्कि हमारे समय का सामाजिक, मानसिक और नैतिक दस्तावेज़ भी है।
ग़ज़ल का पहला ही शेर —
“खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है
लेकिन उसको फिर समझाया जा सकता है”
— जीवन की मजबूरियों और इंसान की तर्कशील प्रवृत्ति को उजागर करता है। यहाँ ‘ज़हर’ केवल पदार्थ नहीं, बल्कि परिस्थितियों, समझौतों और अपमानों का प्रतीक बन जाता है, जिन्हें आदमी हालात के दबाव में स्वीकार करता है और फिर अपने मन को समझा कर जीता रहता है।
“इस दुनिया में हम जैसे भी रह सकते हैं
इस दलदल पर पाँव जमाया जा सकता है”
यह शेर समाज की उस सच्चाई को सामने रखता है, जहाँ मूल्य अक्सर फिसलन भरे दलदल में बदल जाते हैं, फिर भी मनुष्य अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है। यह शेर संघर्ष और जिजीविषा का प्रतीक है।
ग़ज़ल का एक अत्यंत प्रभावशाली शेर है —
“सब से पहले दिल के ख़ाली-पन को भरना
पैसा सारी उम्र कमाया जा सकता है”
यह शेर आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना पर चोट करता है। शकील जमाली साहब यह स्पष्ट कर देते हैं कि आर्थिक सफलता, भावनात्मक रिक्तता का विकल्प नहीं हो सकती। यह शेर आज के उपभोक्तावादी समाज के लिए एक मौन चेतावनी है।
“मैं ने कैसे कैसे सदमे झेल लिए हैं
इस का मतलब ज़हर पचाया जा सकता है”
यहाँ शायर का आत्मविश्वास और जीवन के अनुभव बोलते हैं। दुख, आघात और पीड़ा को पचाकर आगे बढ़ जाना — यही इंसान की असली ताक़त है, जिसे शकील जमाली बेहद सादगी से व्यक्त करते हैं।
ग़ज़ल में रिश्तों और भावनात्मक छल की झलक भी मिलती है —
“इतना इत्मीनान है अब भी उन आँखों में
एक बहाना और बनाया जा सकता है”
यह शेर मानवीय रिश्तों की उस परत को खोलता है, जहाँ सुकून के पीछे छिपा हुआ छल और तर्क गढ़ने की आदत दिखाई देती है।
अंतिम शेर —
“झूट में शक की कम गुंजाइश हो सकती है
सच को जब चाहो झुठलाया जा सकता है”
— आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी को सामने रख देता है। सच और झूठ की अदला-बदली, अफ़वाहों और प्रचार के युग में सत्य का अपमान — यह शेर ग़ज़ल को समकालीन संदर्भों में अत्यंत प्रासंगिक बना देता है।
सब कुल मिलाकर, शकील जमाली साहब की यह ग़ज़ल विचार, अनुभव और संवेदना का सुंदर संगम है। इसमें न कोई बनावटी भावुकता है, न अनावश्यक शोर। यह ग़ज़ल चुपचाप मन में उतरती है और देर तक सवाल छोड़ जाती है। ऐसे अशआर ही साहित्य को ज़िंदा रखते हैं। — रवि कार्तिकेय

