
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों और प्रशासनिक प्रयासों के बीच 23 वर्षीय माओवादी सुनीता का हथियार डालना एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। सुनीता, जो अपने छोटे कद और मासूम चेहरे के कारण अक्सर सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बच जाती थी, पिछले कई वर्षों से माओवादी संगठन के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही थी। अधिकारियों के अनुसार, उसने संगठन के भीतर कई बार हथियारबंद गतिविधियों में भाग लिया और इलाके में नेटवर्क स्थापित करने का काम संभाला। हालांकि समय के साथ लगातार डर और भविष्य की अनिश्चितता ने उसे मानसिक रूप से प्रभावित किया, जिसके बाद उसने आत्मसमर्पण करने का फैसला लिया और सरकारी पुनर्वास नीति का लाभ उठाया।
सुनीता के सरेंडर के बाद खुलासा हुआ कि उसे संगठन की कड़ी और कठोर जीवनशैली ने परेशान कर दिया था। जंगलों में लगातार भागदौड़, लगातार खतरा और साधारण संसाधनों के लिए संघर्ष ने उसके मन में लौटकर सामान्य जीवन जीने की इच्छा जगाई। वह बताती है कि संगठन में काम करने वाली युवतियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें सुरक्षा, भोजन और आराम की कमी शामिल होती है। कई बार परिवार से दूर रहने और भावनात्मक समर्थन न मिलने से मानसिक तनाव बढ़ जाता है। यही कारण रहा कि उसने जोखिम उठाकर आत्मसमर्पण की प्रक्रिया शुरू की और सुरक्षा बलों के सामने अपनी राइफल के साथ पेश हुई। सरेंडर के दौरान सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि सुनीता की वापसी ने एक अन्य माओवादी को भी रास्ता दिखाया। अधिकारियों के अनुसार, सुनीता के फैसले से प्रेरित होकर एक और सक्रिय सदस्य भी सरकारी पुनर्वास के लिए सामने आया, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उसे सुरक्षित हिरासत में लेकर कानूनी प्रक्रिया शुरू की। प्रशासन का कहना है कि ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि अब संगठन के अंदर असंतोष बढ़ रहा है और युवा सदस्य अपनी ज़िंदगी का बेहतर विकल्प तलाशने लगे हैं। सरकार की योजनाओं में शिक्षा, रोजगार और आवास जैसी सुविधाएँ शामिल हैं, जिससे सरेंडर करने वालों को नए सिरे से जीवन शुरू करने का अवसर मिलता है।

