
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 64.4% की रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज की गई है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों और दलों को चौंका दिया है। यह आंकड़ा न केवल पिछले चुनावों से अधिक है, बल्कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के संकेतों को भी हवा दे रहा है। दिलचस्प बात यह है कि बिहार में जब-जब वोटिंग में 5% या उससे अधिक की बढ़ोतरी हुई है, तब-तब सत्ता पलटी है — यह ट्रेंड पिछले 17 विधानसभा चुनावों के विश्लेषण में सामने आया है।
हालांकि इस बार की वोटिंग बढ़त को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कुर्सी पर खतरा बताया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वोटिंग प्रतिशत बढ़ना हमेशा सत्ता परिवर्तन की गारंटी नहीं होता। कई बार यह जनता की जागरूकता, मुद्दों की तीव्रता और क्षेत्रीय समीकरणों का परिणाम भी हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों ने बताया कि 2015 में जब वोटिंग 56.8% से बढ़कर 60.5% हुई थी, तब महागठबंधन ने NDA को सत्ता से बाहर कर दिया था। वहीं 2010 में भी 5% से अधिक की बढ़त के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ था। इस बार के पहले चरण में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही, जिससे सामाजिक मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका को बल मिल सकता है।
अब सभी की निगाहें दूसरे और तीसरे चरण की वोटिंग पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या बिहार एक बार फिर वोटिंग ट्रेंड के आधार पर सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है, या फिर नीतीश कुमार अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल होंगे।

