
प्रधानमंत्री मोदी की CGTMSE स्कीम के तहत बिना गारंटी लोन का सपना दिखाया गया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। जानिए कैसे बैंकों की मनमानी और NPA के डर ने असली जरूरतमंदों को इस योजना से वंचित कर दिया है। एक विशद विश्लेषण।
भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करने के लिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा CGTMSE (Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises) स्कीम का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया। दावा किया गया कि इस योजना के तहत नए स्टार्टअप्स और MSME को बिना किसी ‘कोलैटरल’ (गिरवी रखे बिना) के करोड़ों का फंड मिलेगा। लेकिन क्या यह दावा जमीनी स्तर पर खरा उतर रहा है? या फिर यह महज आंकड़ों की बाजीगरी और सरकारी प्रचार तंत्र का हिस्सा बनकर रह गया है?
बैंकों की मनमानी: पात्र हितग्राही परेशान
ई-पोर्टल की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि सरकार की मंशा और बैंकों के क्रियान्वयन (Execution) में जमीन-आसमान का अंतर है। वह युवा, जिनके पास एक बेहतरीन बिजनेस प्लान है और जो वास्तव में रोजगार सृजन (Job Creation) की क्षमता रखते हैं, वे बैंकों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं।
हैरानी की बात यह है कि CGTMSE स्कीम के तहत सरकार लोन की गारंटी लेती है, फिर भी बैंक मैनेजर ‘NPA’ (Non-Performing Asset) बढ़ने का हवाला देकर असली हकदारों को बैरंग लौटा देते हैं। जो लोग वास्तव में पात्र हैं, उन्हें बैंक यह कहकर टाल देते हैं कि “कोटा नहीं है” या “जोखिम ज्यादा है”, जबकि प्रभावशाली लोगों को आसानी से ऋण स्वीकृत हो जाते हैं।
क्या NPA केवल बहाना है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार गारंटी दे रही है, तो बैंक डर क्यों रहे हैं? वास्तविकता यह है कि बैंकों द्वारा गलत लोगों को लोन देने के कारण ही NPA बढ़ता है। असली उद्यमी, जो ईमानदारी से व्यापार करना चाहता है और लोन चुकाने की नीयत रखता है, उसे सिस्टम की इन जटिलताओं में फंसा दिया जाता है। यह विडंबना ही है कि जिस योजना को ‘गेम चेंजर’ बताया गया था, वह बैंकों की उदासीनता के कारण ‘दम तोड़ती’ नजर आ रही है।
प्रचार तंत्र या राष्ट्र निर्माण? सड़कों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स और अखबारों में पूरे पन्ने के विज्ञापन यह बताते हैं कि सरकार ने करोड़ों का लोन बांटा है। लेकिन क्या यह लोन उन लोगों तक पहुंचा जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी?
आलोचकों का कहना है कि यदि सही व्यक्ति को समय पर फंड नहीं मिल रहा, तो यह योजना देश का भविष्य कैसे बनाएगी? यह केवल ‘प्रोपोगेंडा’ (Propaganda) मात्र है या इसमें कोई ठोस सच्चाई भी है, यह अब जांच का विषय बन चुका है। जनता अब सवाल पूछ रही है कि क्या यह स्कीम केवल वाहवाही लूटने के लिए है, या सच में किसी गरीब और मध्यमवर्गीय उद्यमी की तकदीर बदलने के लिए?
सुधार की आवश्यकता यदि सरकार वास्तव में ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘MSME’ को बढ़ावा देना चाहती है, तो उसे केवल फंड जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बैंकों की जवाबदेही (Accountability) तय करनी होगी। जब तक पात्र हितग्राहियों को आसानी से और पारदर्शी तरीके से CGTMSE का लाभ नहीं मिलेगा, तब तक यह योजना ‘सफल’ नहीं, बल्कि केवल ‘विज्ञापित’ ही मानी जाएगी।


