
मध्य प्रदेश के एक ग्रामीण इलाके में एक किसान ने आर्थिक तंगी और कर्ज के बोझ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। मृतक किसान ने गांव के बाहर एक नीम के पेड़ पर फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी। यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि राज्य में किसानों की बदहाल स्थिति और मानसिक दबाव की एक और भयावह तस्वीर पेश करती है।
जानकारी के अनुसार, मृतक किसान पिछले कुछ वर्षों से खेती में लगातार घाटा झेल रहा था। उसने साहूकारों और सहकारी समितियों से कर्ज लिया था, लेकिन मौसम की मार और फसल की कीमतों में गिरावट के कारण वह उसे चुका नहीं पाया। परिजनों ने बताया कि तीन महीने पहले उसने नशे की आदत छोड़ दी थी और जीवन को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन आर्थिक दबाव और सामाजिक उपेक्षा ने उसे अंदर ही अंदर तोड़ दिया।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा। प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है और कहा है कि किसान के परिवार को नियमानुसार राहत दी जाएगी। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है — क्षेत्र में कई किसान कर्ज और मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर चुके हैं।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल उठाती है कि क्या हमारी कृषि नीति, कर्ज राहत योजनाएं और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं ग्रामीण भारत तक प्रभावी रूप से पहुंच रही हैं। किसान, जो देश की रीढ़ हैं, अगर इसी तरह टूटते रहे तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार होगी।

