
उमरिया जिले के हथपुरा गांव में वन विभाग और पुलिस की संयुक्त छापेमारी के दौरान एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया जिसने वन्यजीव तस्करी के बदलते तौर-तरीकों को उजागर कर दिया। एक व्यक्ति, जो पादरी के भेष में गांव में धार्मिक गतिविधियों में शामिल था, दरअसल दुर्लभ वन्यजीव पेंगोलीन की तस्करी में लिप्त पाया गया। उसने अपने धार्मिक वेश और व्यवहार से ग्रामीणों का विश्वास जीत लिया था और इसी भरोसे का फायदा उठाकर उसने तस्करी का जाल फैला रखा था। छापेमारी के दौरान उसके पास से पेंगोलीन की खाल, अंग और तस्करी से जुड़े दस्तावेज़ बरामद हुए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वह लंबे समय से इस अवैध गतिविधि में संलिप्त था। पेंगोलीन एक अत्यंत संवेदनशील और संरक्षित प्रजाति है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है, खासकर पारंपरिक दवाओं और अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाओं में। भारत में इसकी तस्करी वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत गंभीर अपराध है। आरोपी ने पूछताछ में यह भी स्वीकार किया कि उसका नेटवर्क देश के अन्य हिस्सों में फैला हुआ है, जिससे यह मामला एक संगठित गिरोह की ओर इशारा करता है। प्रशासन ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और उसके नेटवर्क की कड़ियाँ जोड़ने में जुट गया है। यह घटना दर्शाती है कि वन्यजीव तस्करी अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि धार्मिक और सामाजिक पहचान का दुरुपयोग कर ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल रही है। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ जनजागरूकता अभियान चलाना बेहद ज़रूरी है, ताकि वन्यजीवों की रक्षा और सामाजिक सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सके।

