
क्या मध्य प्रदेश में लोकतंत्र ‘फाइलों‘ में कैद है? अच्छे लोगों और समाजसेवकों को राज्यपाल से मिलने के लिए करना पड़ रहा है अंतहीन इंतजार।
तल्ख सवाल: क्या राजभवन सिर्फ वीआईपी कल्चर का अड्डा है?
भोपाल। मध्य प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख यानी महामहिम राज्यपाल को लेकर अब गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या प्रदेश के मुखिया के पास सिर्फ ‘सत्ता‘ और ‘सियासत‘ के लिए समय है? खबर है कि समाज के लिए बेहतर काम करने वाले लोग और अपनी समस्याओं को लेकर भटक रही आम जनता जब राजभवन का दरवाजा खटखटाती है, तो उन्हें सिर्फ ‘तारीख पर तारीख‘ मिलती है।
अच्छे काम की कद्र नहीं या वक्त की कमी?
हैरानी की बात यह है कि जो लोग प्रदेश के विकास में अपना पसीना बहा रहे हैं, जो निष्पक्ष भाव से जनता की सेवा कर रहे हैं, उन्हें भी महामहिम से मिलने का समय नहीं मिल पा रहा। क्या राजभवन की चारदीवारी इतनी ऊंची हो गई है कि नीचे बैठी जनता की आवाज ऊपर तक नहीं पहुँच रही?
जनता पूछ रही है– क्या आप ही चला रहे हैं पूरा प्रदेश?
आज आम आदमी के मन में यह कड़वा सवाल है कि क्या पूरा प्रदेश सिर्फ राजभवन की मर्जी से चल रहा है? अगर राज्यपाल ही जनता के लिए उपलब्ध नहीं होंगे, तो लोकतंत्र के इस मंदिर में ‘जनता जनार्दन‘ की जगह कहाँ है? क्या राज्यपाल का पद सिर्फ औपचारिक आयोजनों और लाल फीताशाही तक सीमित रह गया है?
मुख्य बिंदु जो चर्चा में हैं:
● अपॉइंटमेंट का सूखा: समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को हफ्तों तक नहीं मिल रहा मिलने का समय।
● दरवाजे बंद, फाइलें चालू: क्या केवल कागजी काम ही राज्यपाल की प्राथमिकता है
● आम आदमी की अनदेखी: क्या मध्य प्रदेश का राजभवन ‘आम‘ से ज्यादा ‘खास‘ का हो गया है?
“लोकतंत्र में राजा नहीं, जनता का सेवक सबसे बड़ा होता है। अगर राजभवन के दरवाजे जनता के लिए बंद हैं, तो यह व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।“
अब देखना यह है कि क्या इस आक्रोश के बाद राजभवन के दरवाजे आम जनता और नेक काम करने वालों के लिए खुलते हैं, या फिर यह ‘शाही बेरुखी‘ यूं ही जारी रहेगी। मध्य प्रदेश की जनता देख रही

