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रसरंग में मायथोलॉजी: समय और स्थान के साथ धर्म भी बदल लेते हैं अपना स्वरूप

मायथोलॉजी केवल प्राचीन कथाओं या देवी-देवताओं की कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक चेतना, उसकी सोच और उसके बदलते मूल्यों का प्रतिबिंब भी है। रसरंग में मायथोलॉजी का अर्थ है—धर्म, आस्था और परंपराओं का वह प्रवाह, जो समय और स्थान के साथ अपने रंग, रूप और अर्थ बदलता रहता है।

समय के साथ बदलती धार्मिक व्याख्याएँ
हर युग अपने सवालों के साथ आता है और धर्म उन्हीं सवालों के जवाब देने के लिए नए अर्थ ग्रहण करता है। जो प्रतीक कभी शक्ति का संकेत थे, वे किसी और दौर में करुणा या संयम के रूप में समझे जाने लगते हैं। यही कारण है कि एक ही पौराणिक कथा अलग-अलग समय में अलग संदेश देती दिखाई देती है। धर्म स्थिर नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा है, जो समाज की जरूरतों के अनुसार स्वयं को ढालती है।

 

स्थान और संस्कृति का प्रभाव
भौगोलिक सीमाएँ भी मायथोलॉजी के स्वरूप को प्रभावित करती हैं। एक ही देवता या कथा अलग क्षेत्रों में अलग रूप, अलग नाम और अलग परंपराओं के साथ पूजी जाती है। स्थानीय संस्कृति, लोककथाएँ और सामाजिक संरचना धर्म को नया रंग देती हैं। यह विविधता टकराव नहीं, बल्कि समृद्धि का संकेत है—जहाँ विश्वास एक ही रहता है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति अनेक होती है।

gaurav
Author: gaurav

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