वल्लभ भवन की पाँचवीं मंज़िल: जहाँ ‘स्वविवेक’ नहीं, ‘सुनी-सुनाई’ बातों पर टिके हैं निर्णय

लोकतंत्र में जनसेवा का अर्थ हैजनता के बीच जाना, उनकी समस्याओं को प्रत्यक्ष देखना और न्यायोचित निर्णय लेना। किंतु मध्य प्रदेश के सत्ता केंद्र, वल्लभ भवन की पाँचवीं मंज़िल से एक विचलित करने वाली कार्यशैली की गूँज सुनाई दे रही है। यहाँ एक वरिष्ठ सचिव स्तर के अधिकारी अपनीदृष्टिऔरश्रवण शक्तिके लिए स्वयं के अनुभवों के बजाय, दूसरों के कान और आँखों पर निर्भर हो गए हैं।

क्या लोकतंत्र फाइलों और चाटुकारिता के बीच दम तोड़ रहा है? वल्लभ भवन के गलियारों में चर्चा है कि एक रसूखदार अधिकारी ने जनता से दूरी बना ली हैनियम कहते हैं कि अधिकारी को जनता का सेवक होना चाहिए, लेकिन यहाँ की हकीकत कुछ और ही है। साहब जनता से मिलना तो दूर, जमीनी हकीकत को भी केवल अपने खासदरबारियोंके चश्मे से देख रहे हैं।

रिपोर्ट की मुख्य बातें:

     भविष्यवाणी की कार्यशैली: अधिकारी महोदय स्वयं तथ्यों की जांच करने के बजाय, आसपास मौजूदकान भरने वालोंकी बातों को सत्य मानकर भविष्य की योजनाएं और निर्णय ले रहे हैं।

     जनता की अनदेखी: पद की गरिमा जनता की शिकायतों के निवारण में होती है, कि बंद कमरों में बैठकर दूसरों की राय पर मुहर लगाने में। जब निर्णयसुनीसुनाईबातों पर होते हैं, तो पात्र व्यक्ति वंचित रह जाता है और अपात्र का बोलबाला होता है।

     लोकतंत्र पर संकट: यदि शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया इतनी संकुचित हो जाए, तो आम नागरिक का तंत्र से भरोसा उठना स्वाभाविक है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन भी है।

इतिहास गवाह है कि जबजब शासक या प्रशासक जनता से कटकरबिचौलियोंकी सलाह पर निर्भर हुए हैं, तबतब व्यवस्था ध्वस्त हुई है। यदि यही सिलसिला जारी रहा, तो जनता का आक्रोश और व्यवस्था की जड़ता राज्य के विकास को बाधित कर देगी। भविष्य अंधकारमय दिखता है, क्योंकि जहाँस्वयं के कानबंद हों औरदूसरों के विवेकसे फैसले हों, वहाँ न्याय केवल एक शब्द बनकर रह जाता है।

  • Gaurav Singh

    Gaurav Singh

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