
इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज का पथ-प्रदर्शक पीड़ित हुआ है, तब-तब व्यवस्थाओं में बड़े परिवर्तन आए हैं। लेकिन आज सवाल उत्तर प्रदेश की उस धरती से उठ रहा है जिसे ‘धर्म और राजनीति का केंद्र’ कहा जाता है। क्या योगी युग में ब्राह्मण समाज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है? क्या सत्ता की चकाचौंध में विप्र समाज की अस्मिता और स्वाभिमान को हाशिए पर धकेल दिया गया है?
हाल के दिनों में शंकराचार्य जी के साथ हुए व्यवहार और प्रदेश के विभिन्न कोनों से आने वाली ब्राह्मण उत्पीड़न की खबरों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जिस समाज ने कभी राष्ट्र को दिशा दी, क्या आज वह अपनी ही एकजुटता खो चुका है? लोग पूछ रहे हैं कि क्या ब्राह्मण अधिकारी और नेता सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए ‘मौन’ साधे हुए हैं?
समाज के भीतर से यह आवाज उठ रही है कि सत्ता में बैठे रसूखदार ब्राह्मण चेहरे अपने ही भाइयों के पतन पर मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं? क्या ‘रोटी और राजनीति’ इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि समाज का मान-मर्दन भी अब गौण नजर आता है?
तीखे सवाल आज का सबसे बड़ा सवाल यह है कि:
- क्या ब्राह्मण समाज अपनी एकता का परिचय देने में विफल रहा है?
- क्यों आए दिन विप्र समाज के लोगों के साथ होने वाली घटनाओं पर प्रशासनिक न्याय केवल फाइलों तक सीमित है?
- क्या वर्तमान राजनीतिक ढांचा ब्राह्मणों को केवल ‘वोट बैंक’ की मशीन समझता है?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अब समय आ गया है कि समाज अपने ‘रौद्र रूप’ का परिचय दे, जैसा कि इतिहास में चाणक्य ने किया था?
पतन की पराकाष्ठा तब होती है जब बुद्धिजीवी वर्ग चुप हो जाता है। यदि समय रहते समाज ने अपनी संगठित शक्ति का परिचय नहीं दिया, तो यह केवल एक वर्ग का नहीं बल्कि पूरे सामाजिक संतुलन का पतन होगा। अब देखना यह है कि सत्ता के गलियारों में बैठे ‘ब्राह्मण चेहरे’ अपनी निष्ठा कुर्सी के प्रति दिखाते हैं या अपने स्वाभिमान के प्रति।

