
राजनीति और सामाजिक संगठनों (जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा) की नींव हमेशा से ‘त्याग‘, ‘तपस्या‘ और ‘अंत्योदय‘ के सिद्धांतों पर टिकी रही है। एक समय था जब संगठन का मंत्री वह व्यक्ति होता था जो साइकिल पर चलता था, जिसका जीवन खुली किताब था, और जिसकी पहचान समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ उसके जुड़ाव से होती थी। लेकिन, 21वीं सदी के इस दौर में, यह तस्वीर धुंधली ही नहीं, बल्कि पूरी तरह बदल चुकी है।
आज सवाल किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि उस ‘मॉडल‘ का है, जो समाज के सामने खड़ा किया जा रहा है।
जादुई तरक्की: दिनों में नहीं, मिनटों का खेल
आज के दौर में प्रदेश के संगठन मंत्रियों या राजनीतिक रसूखदारों के पास ऐसी कौन सी ‘जादू की छड़ी‘ है, जो उन्हें पसीने से लथपथ साइकिल से उतारकर वातानुकूलित (AC) फॉर्च्यूनर या लग्जरी गाड़ियों में बिठा देती है? यह सवाल आज हर आम नागरिक की जुबान पर है।
यह वह कारोबार है जो बैलेंस शीट पर नहीं दिखता। यह कारोबार है—‘प्रभाव का व्यापार‘ (Influence Peddling)। पहले जहाँ संगठन का काम विचारधारा का प्रसार था, अब वह कथित तौर पर ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग‘, ‘ठेकेदारी‘ और ‘बड़े अधिकारियों की पोस्टिंग‘ का सिंडिकेट बन गया है। जिसे मिनटों में संपत्ति अर्जित करते देखा जा रहा है, वह वास्तव में जनता के विश्वास का सौदा है।
युवाओं पर पड़ता घातक प्रभाव: शॉर्टकट की अंधी दौड़
इस पूरे परिदृश्य का सबसे भयानक पहलू देश के युवाओं पर पड़ रहा है। एक 20-22 साल का नौजवान जब देखता है कि उसके क्षेत्र का नेता बिना किसी
visible business (दृश्य व्यापार) के मिनटों में करोड़पति बन गया है, तो उसकी मानसिकता बदल जाती है।
वह मेहनत, शिक्षा और संघर्ष का रास्ता छोड़ देता है। उसे लगता है कि ‘पावर‘ और ‘जुगाड़‘ ही सफलता की कुंजी है। वह भी उसी ‘फॉर्च्यूनर लाइफस्टाइल‘ को पाने के लिए शॉर्टकट खोजता है। और जब वह राजनीतिक संरक्षण या रातों-रात अमीर बनने में विफल होता है, तो हताशा उसे घेर लेती है।
- यही हताशा उसे नशे (Drugs) की ओर धकेलती है।
- लग्जरी जीवन जीने की चाह उसे चोरी, डकैती और अवैध धंधों में उतार देती है।
आज का युवा, नेता के आदर्शों का नहीं, बल्कि उसकी ‘लग्जरी‘ का अनुयायी बन रहा है, जो राष्ट्र के भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है।
‘जनता‘ से ‘धन्नासेठों‘ तक का सफर
पुराने दौर के संगठन मंत्री जनता और सरकार के बीच सेतु (Bridge) हुआ करते थे। आज यह सेतु ‘अधिकारियों‘ और ‘नेताओं‘ के बीच का गुप्त गलियारा बन गया है। अब प्राथमिकता यह नहीं है कि आम आदमी राशन की लाइन में क्यों खड़ा है। प्राथमिकता यह है कि “किस अधिकारी की पोस्टिंग कहाँ करानी है” ताकि वह भविष्य में ‘ख्याल‘ रख सके। यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जहाँ:
1. अधिकारी चापलूसी (Sycophancy) करता है।
2. नेता संरक्षण देता है।
3. आम जनता केवल एक ‘वोट बैंक‘ बनकर रह जाती है।
डिजिटल दीवार: फेसबुक, वॉट्सऐप और AI का भ्रम
विडंबना यह है कि टेक्नोलॉजी, जिसे पारदर्शिता लानी थी, वह अब जनता से दूरी बनाने का हथियार बन गई है। वर्तमान संगठन मंत्री धरातल (Ground) पर नहीं, बल्कि फेसबुक, वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम की रील्स (Reels) में सक्रिय हैं।
जनता की समस्याओं का समाधान अब ‘संवाद‘ से नहीं, बल्कि AI (Artificial Intelligence) द्वारा जेनरेट किए गए डेटा और सोशल मीडिया कैंपेन से किया जा रहा है। जब कोई नेता जमीनी हकीकत के बजाय स्क्रीन पर अपनी लोकप्रियता मापता है, तो वह उस दर्द को कभी महसूस नहीं कर सकता जो एक आम नागरिक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते हुए महसूस करता है।
वक्त है जागने का
यह केवल भारत की कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक ढांचों में आ रही गिरावट का एक क्लासिक उदाहरण है। यदि राजनीति को सेवा से हटाकर ‘मिनटों में फॉर्च्यूनर‘ खरीदने का माध्यम बना दिया जाएगा, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो मेहनत से नफरत करेगी और अपराध को अवसर मानेगी।
समाज को अब इन ‘डिजिटल नेताओं‘ और ‘लग्जरी संगठन मंत्रियों‘ से सवाल पूछना होगा—आपकी संपत्ति का स्रोत क्या है? और आपका समय जनता के लिए है या केवल अपनी ‘ब्रांडिंग‘ के लिए?


