भोज विश्वविद्यालय में ‘नियम विरुद्ध’ नियुक्ति पर सन्नाटा: क्या मुख्यमंत्री की ज़ीरो टॉलरेंस नीति सिर्फ कागज़ी है?

भोपाल: मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और उच्च शिक्षा विभाग में इन दिनों एक बड़ा सवाल गूँज रहा है—क्या नियम और कानून केवल आम जनता के लिए हैं? भोज मुक्त विश्वविद्यालय में डॉ. सुनील मंडारिया की रजिस्ट्रार पद पर हुई नियुक्ति को लेकर जो खुलासे हुए हैं, वे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

डॉ. सुनील मंडारिया, जो मूलतः सहायक प्रोफेसर (Assistant Professor) के पद पर कार्यरत थे, उन्हें नियमों को ताक पर रखकर भोज विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया। इस मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि स्वयं प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने इस नियुक्ति को ‘गलत’ माना है। इसके बावजूद, हफ्तों बीत जाने के बाद भी अब तक मंडारिया पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।

जब स्वयं विभागीय मंत्री यह स्वीकार कर रहे हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया दोषपूर्ण है, तो आखिर वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो इस अवैध नियुक्ति को ढाल प्रदान कर रही है?

ज़ीरो टॉलरेंस पर तीखे सवाल:  ज़ीरो टॉलरेंस क्या मजाक वाला शब्द बन गया है
यह स्थिति मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की कार्यशैली पर सीधा प्रहार करती है:

भोज विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इस तरह की ‘अवैध’ नियुक्तियां प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को खत्म कर रही हैं। यदि तत्काल डॉ. सुनील मंडारिया और इस घोटाले में शामिल अन्य दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तो यह मान लिया जाएगा कि प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग सिर्फ एक दिखावा है।

ब्रैंडवाणी समाचार पूछता है क्या शासन में बैठे जिम्मेदार लोग इस ‘अपराध’ पर संज्ञान लेंगे या रसूखदारों के आगे नतमस्तक रहेंगे?

Shruti Soni

ब्रांडवाणी समाचार

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