brandwaani.in

🕒 --:--:--
---
ब्रांडवाणी समाचार
Gold (10g) ₹-- --
Silver (1kg) ₹-- --
Weather
Loading Data...

साइकिल से फॉर्च्यूनर तक: राजनीतिक ‘त्याग’ का कॉर्पोरेटाइजेशन और बर्बाद होता भविष्य

राजनीति और सामाजिक संगठनों (जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा) की नींव हमेशा से त्याग‘, ‘तपस्याऔर अंत्योदयके सिद्धांतों पर टिकी रही है। एक समय था जब संगठन का मंत्री वह व्यक्ति होता था जो साइकिल पर चलता था, जिसका जीवन खुली किताब था, और जिसकी पहचान समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ उसके जुड़ाव से होती थी। लेकिन, 21वीं सदी के इस दौर में, यह तस्वीर धुंधली ही नहीं, बल्कि पूरी तरह बदल चुकी है।

आज सवाल किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि उस मॉडल का है, जो समाज के सामने खड़ा किया जा रहा है।

जादुई तरक्की: दिनों में नहीं, मिनटों का खेल

आज के दौर में प्रदेश के संगठन मंत्रियों या राजनीतिक रसूखदारों के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ीहै, जो उन्हें पसीने से लथपथ साइकिल से उतारकर वातानुकूलित (AC) फॉर्च्यूनर या लग्जरी गाड़ियों में बिठा देती है? यह सवाल आज हर आम नागरिक की जुबान पर है।

यह वह कारोबार है जो बैलेंस शीट पर नहीं दिखता। यह कारोबार है—प्रभाव का व्यापार‘ (Influence Peddling)। पहले जहाँ संगठन का काम विचारधारा का प्रसार था, अब वह कथित तौर पर ट्रांसफर-पोस्टिंग‘, ‘ठेकेदारीऔर बड़े अधिकारियों की पोस्टिंगका सिंडिकेट बन गया है। जिसे मिनटों में संपत्ति अर्जित करते देखा जा रहा है, वह वास्तव में जनता के विश्वास का सौदा है।

युवाओं पर पड़ता घातक प्रभाव: शॉर्टकट की अंधी दौड़

इस पूरे परिदृश्य का सबसे भयानक पहलू देश के युवाओं पर पड़ रहा है। एक 20-22 साल का नौजवान जब देखता है कि उसके क्षेत्र का नेता बिना किसी

visible business (दृश्य व्यापार) के मिनटों में करोड़पति बन गया है, तो उसकी मानसिकता बदल जाती है।

वह मेहनत, शिक्षा और संघर्ष का रास्ता छोड़ देता है। उसे लगता है कि पावरऔर जुगाड़ही सफलता की कुंजी है। वह भी उसी फॉर्च्यूनर लाइफस्टाइल को पाने के लिए शॉर्टकट खोजता है। और जब वह राजनीतिक संरक्षण या रातों-रात अमीर बनने में विफल होता है, तो हताशा उसे घेर लेती है।

  • यही हताशा उसे नशे (Drugs) की ओर धकेलती है।
  • लग्जरी जीवन जीने की चाह उसे चोरी, डकैती और अवैध धंधों में उतार देती है।

आज का युवा, नेता के आदर्शों का नहीं, बल्कि उसकी लग्जरीका अनुयायी बन रहा है, जो राष्ट्र के भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। 

जनतासे धन्नासेठोंतक का सफर

पुराने दौर के संगठन मंत्री जनता और सरकार के बीच सेतु (Bridge) हुआ करते थे। आज यह सेतु अधिकारियोंऔर नेताओंके बीच का गुप्त गलियारा बन गया है। अब प्राथमिकता यह नहीं है कि आम आदमी राशन की लाइन में क्यों खड़ा है। प्राथमिकता यह है कि किस अधिकारी की पोस्टिंग कहाँ करानी है” ताकि वह भविष्य में ख्यालरख सके। यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जहाँ:

1.  अधिकारी चापलूसी (Sycophancy) करता है।

2.  नेता संरक्षण देता है।

3.  आम जनता केवल एक वोट बैंकबनकर रह जाती है।

डिजिटल दीवार: फेसबुक, वॉट्सऐप और AI का भ्रम

विडंबना यह है कि टेक्नोलॉजी, जिसे पारदर्शिता लानी थी, वह अब जनता से दूरी बनाने का हथियार बन गई है। वर्तमान संगठन मंत्री धरातल (Ground) पर नहीं, बल्कि फेसबुक, वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम की रील्स (Reels) में सक्रिय हैं।

जनता की समस्याओं का समाधान अब संवादसे नहीं, बल्कि AI (Artificial Intelligence) द्वारा जेनरेट किए गए डेटा और सोशल मीडिया कैंपेन से किया जा रहा है। जब कोई नेता जमीनी हकीकत के बजाय स्क्रीन पर अपनी लोकप्रियता मापता है, तो वह उस दर्द को कभी महसूस नहीं कर सकता जो एक आम नागरिक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते हुए महसूस करता है।

वक्त है जागने का

यह केवल भारत की कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक ढांचों में आ रही गिरावट का एक क्लासिक उदाहरण है। यदि राजनीति को सेवा से हटाकर मिनटों में फॉर्च्यूनरखरीदने का माध्यम बना दिया जाएगा, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो मेहनत से नफरत करेगी और अपराध को अवसर मानेगी।

समाज को अब इन डिजिटल नेताओंऔर लग्जरी संगठन मंत्रियोंसे सवाल पूछना होगा—आपकी संपत्ति का स्रोत क्या है? और आपका समय जनता के लिए है या केवल अपनी ब्रांडिंगके लिए?

gaurav
Author: gaurav

  • Related Posts

    सागर कलेक्टर संदीप जीआर की बढ़ी मुश्किलें: 25 लाख के निजी काम और बिल रोकने के गंभीर आरोप, क्या गिरेगी गाज?

    सागर, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों भारी हलचल है। अशोकनगर और सिंगरौली कलेक्टरों पर हुई हालिया कार्रवाई के बाद अब सागर कलेक्टर संदीप जीआर (Sagar Collector Sandeep GR)…

    Read more

    आगे पढ़े
    भ्रष्टाचार बनाम नियम का जाल: विकास की बलि चढ़ती मध्यप्रदेश की जनता और व्यापारी ?

    अधिकारी चाहे ‘ईमानदार‘ हों या ‘भ्रष्ट‘, पिस रही है जनता; नियमों की आड़ में विकास पर लगा ब्रेक भोपाल। मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है। मुख्य…

    Read more

    आगे पढ़े

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *