
भारतीय राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सवाल केवल सत्ता से नहीं, बल्कि विपक्ष से भी हैं। देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के पास आज भी 24 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं और देश के हर कोने में करोड़ों समर्पित कार्यकर्ता। इसके बावजूद, जनता के मन में एक ही टीस है— वह बड़ा आंदोलन कहाँ है?
जनता के वो सवाल, जिनका जवाब विपक्ष को देना होगा
आज आम आदमी महंगाई से त्रस्त है, लेकिन सड़कों पर वह जनाक्रोश नहीं दिख रहा जो कभी सरकारों को हिला दिया करता था। विपक्ष की एकजुटता और सक्रियता पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं:
- महंगाई और मनमानी: क्या विपक्ष मध्यम वर्ग की जेब पर पड़ रही मार को रोकने के लिए कोई निर्णायक लड़ाई लड़ेगा?
- ED और CBI का चक्रव्यूह: विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है, लेकिन क्या केवल बयानों से इसे रोका जा सकता है?
- पूंजीवाद का बोलबाला: आरोप लगते हैं कि सरकार केवल कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों के लिए काम कर रही है। बड़े कॉर्पोरेट कर्ज माफ हो रहे हैं, पर किसान और छोटे व्यापारी बेहाल हैं। विपक्ष इस ‘चिट्ठे‘ को जनता की अदालत तक ले जाने में विफल क्यों है?
- झूठ के खिलाफ सत्य की लड़ाई: सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच जो खाई है, उसे पाटने के लिए कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं हो रहा?
24 करोड़ की ताकत, फिर भी विपक्ष बिखरा हुआ?
आंकड़े गवाह हैं कि देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी विपक्ष की विचारधारा में विश्वास रखता है। लेकिन क्या यह 24 करोड़ की भीड़ एक संगठित शक्ति बन पाएगी? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विपक्ष ने जल्द ही अपने मतभेद भुलाकर ‘साझा न्यूनतम कार्यक्रम‘ के तहत जमीन पर उतरकर संघर्ष नहीं किया, तो लोकतंत्र में विपक्ष का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
क्या देश एक बड़ी ‘क्रांति‘ की ओर बढ़ रहा है?
इतिहास गवाह है कि जब–जब जनता की समस्याओं को अनसुना किया गया है और विपक्ष कमजोर पड़ा है, तब–तब जनता के बीच से ही कोई ‘बड़ा आंदोलन‘ जन्म लेता है। क्या आने वाले समय में हमें जेपी आंदोलन जैसा कुछ देखने को मिलेगा? या फिर विपक्ष अपनी सोई हुई ताकत को जगाकर सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ सड़क से संसद तक एक अभेद्य दीवार खड़ी करेगा?
लोकतंत्र तब तक जीवित है जब तक विपक्ष जीवित है। 24 करोड़ लोगों की उम्मीदें आज इस बात पर टिकी हैं कि उनका नेतृत्व कब ड्राइंग रूम की राजनीति छोड़कर धूल और पसीने वाली राजनीति में उतरेगा।


Ye bahut sahi baat kahi hai