
सपनों का कत्ल और कागजों का जाल
आज भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम और सूक्ष्म–लघु उद्योग (MSME) एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ सरकारी प्रोत्साहन के लुभावने विज्ञापन हैं, तो दूसरी तरफ GST की जटिलता, बैंक के कठोर नियम और Income Tax की दबिश का खौफ। यह केवल नीतिगत विफलता नहीं है, बल्कि यह उन ‘सफेदपोश‘ अधिकारियों और नीति–निर्धारकों की कुत्सित मानसिकता का परिणाम है, जो चुनिंदा पूँजीपतियों की तिजोरियाँ भरने के लिए छोटे व्यापारियों की बलि दे रहे हैं।
राजशाही से पूँजीवाद तक का सफर: क्या हम पीछे जा रहे हैं?
इतिहास गवाह है कि कभी सरकारें छोटे व्यापारियों को संरक्षण देकर राजशाही और गुलामी की बेड़ियों को तोड़ती थीं। लेकिन आज परिदृश्य विपरीत है। छोटे व्यापारियों को ‘अनुपालन‘ (Compliance) के नाम पर इतना उलझा दिया गया है कि वे व्यापार करने के बजाय कागजों को दुरुस्त करने में ही अपना जीवन खपा रहे हैं। यह ‘नया पूँजीवाद‘ (Crony Capitalism) पुराने जमाने की राजशाही से भी घातक है, क्योंकि यहाँ गला छोटे व्यापारी का घोंटा जा रहा है और मलाई बड़े घरानों को परोसी जा रही है।
GST और छापेमारी: सुधार या प्रहार?
सरकार जिसे ‘आर्थिक सुधार‘ कहती है, वह छोटे व्यापारियों के लिए ‘आर्थिक प्रहार‘ बन चुका है।
- GST की मार: एक छोटी सी मानवीय भूल पर भारी जुर्माना और खातों को फ्रीज कर देना, क्या यही व्यापार सुगमता है?
- IT रेड का आतंक: भय का माहौल बनाकर व्यापार नहीं किया जा सकता। आज अधिकारी व्यापारियों को अपराधी की दृष्टि से देखते हैं, जबकि वही व्यापारी देश की GDP की रीढ़ है।
पूँजीवाद का दानव और छिनता रोजगार
जब एक बड़ा कॉर्पोरेट घराना बाजार पर कब्जा करता है, तो हजारों छोटे दुकानदार और स्थानीय सप्लायर बेरोजगार हो जाते हैं। पूँजीवाद रोजगार पैदा नहीं करता, बल्कि वह मुनाफे का केंद्रीकरण करता है। लाखों लोगों का रोजगार छीनकर मुट्ठी भर लोगों को अमीर बनाना क्या ‘सबका साथ, सबका विकास‘ है?
आह्वान: अब नहीं तो कब?
छोटे व्यापारियों की बिखरी हुई ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। जब तक देश का लघु व्यापारी एक मंच पर आकर इस ‘पूँजीवादी तंत्र‘ के खिलाफ जन–आंदोलन का बिगुल नहीं फूंकेगा, तब तक दिल्ली के दरबार में उनकी चीखें नहीं सुनी जाएंगी। यह समय याचना का नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए रण का है।
केद्र सरकार को यह समझना होगा कि यदि देश का मध्यम और लघु वर्ग समाप्त हो गया, तो लोकतंत्र केवल चंद पूँजीपतियों की कठपुतली बनकर रह जाएगा। सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी ‘मानसिक गंदगी‘ को साफ करें, इससे पहले कि व्यापारियों का आक्रोश एक ऐसी क्रांति का रूप ले ले जिसे संभालना नामुमकिन हो जाए।


Ye bahut fact ki baat hai.