
आज हर हाथ में मोबाइल है, लेकिन क्या आप जो देख रहे हैं वह सच है? जानिए कैसे राजनीतिक साइबर सेल (Cyber Cell) और एल्गोरिदम आपके दिमाग से खेल रहे हैं और सच को झूठ के पर्दे में छिपा रहे हैं। एक विशेष रिपोर्ट।
भारत में डिजिटल क्रांति का सूर्योदय हुआ तो उम्मीद थी कि ज्ञान का प्रकाश घर–घर पहुंचेगा। लेकिन आज विडंबना यह है कि इंटरनेट का सस्ता डेटा ज्ञान नहीं, बल्कि ‘भ्रम‘ का सबसे बड़ा वाहक बन गया है। आज जब हर बच्चे और बुजुर्ग के हाथ में मोबाइल है, तब एक अदृश्य ‘साइबर युद्ध‘ (Cyber Warfare) छिड़ा हुआ है, जिसका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि समाज की सोचने–समझने की शक्ति को खत्म करना है।
नैरेटिव का खेल और साइबर सेल का दबदबा
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अब आम है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का संगठनात्मक ढांचा और उनकी ‘साइबर सेल‘ की कार्यप्रणाली अभूतपूर्व है। आलोचकों का मानना है कि इस तंत्र ने सोशल मीडिया को एक ऐसे हथियार में बदल दिया है, जहाँ अपनी छवि को ‘महामानव‘ की तरह प्रस्तुत करना और विरोधियों के छोटे से बयान को तिल का ताड़ बनाकर उनका चरित्र हनन (Character Assassination) करना एक सामान्य प्रक्रिया बन गई है।
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी (WhatsApp University) से लेकर फेसबुक और ट्विटर (X) तक, एक सुव्यवस्थित मशीनरी काम करती है। यह मशीनरी इतनी तेज है कि सत्य जब तक जूते पहन रहा होता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है।
सच्चाई से मुंह मोड़ता समाज
सबसे खतरनाक पहलू किसी दल का प्रचार नहीं, बल्कि आम जनता की बदलती मानसिकता है। आज का उपभोक्ता (User) सच नहीं जानना चाहता; वह केवल वही सुनना और देखना चाहता है जो उसकी पहले से बनी धारणाओं को सही ठहराए (Confirmation Bias)।
बीजेपी और संघ की विचारधारा से प्रेरित कंटेंट हो या उनके विरोध में कोई तथ्य, लोग अब तर्क नहीं करते, सीधे ‘फॉरवर्ड‘ करते हैं। मोबाइल स्क्रीन पर परोसी गई हर जानकारी को अंतिम सत्य मान लेना आज की पीढ़ी के लिए एक नशा बन गया है।
बच्चों के भविष्य पर मंडराता खतरा
चिंता का विषय यह है कि इस डिजिटल कोलाहल में हमारे बच्चे भी शामिल हैं। जिन मोबाइलों में शिक्षा होनी चाहिए थी, वहां अब राजनीतिक द्वेष और एकतरफा विचारधारा का जहर घोला जा रहा है। एक वर्ग विशेष या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नफरत फैलाना इतना आसान हो गया है कि इसके लिए किसी बड़े मीडिया हाउस की जरूरत नहीं, बस 10 रुपये का डेटा और एक ‘एडिटेड वीडियो‘ काफी है।
क्या हम ‘डिजिटल गुलाम‘ बन रहे हैं?
यह समय आत्मचिंतन का है। क्या हम सूचनाओं के स्वामी हैं या किसी ‘आईटी सेल‘ के गुलाम? अगर हमने अभी फिल्टर करना नहीं सीखा कि क्या सच है और क्या प्रोपेगेंडा, तो हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जहाँ सवाल पूछना मना होगा और झूठ ही एकमात्र सत्य होगा।
यह ‘डिजिटल नशा‘ धीमे जहर की तरह है, जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है।



Ye sahi baat hai loktantra bachna chahiye.
Great news
Bahot jyada sacchai hai ye