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पूंजीपतियों के लिए ‘लाल कालीन’ और आम उद्यमी के लिए ‘लाल फीताशाही’— क्या देश में फिर दस्तक देगा ‘जेपी आंदोलन’ जैसा व्यापारी सत्याग्रह?

आज देश और प्रदेश की आर्थिक नीतियों के केंद्र मेंपूंजीवादइस कदर हावी हो चुका है किविकासकी परिभाषा केवल चंद बड़े घरानों तक सिमट कर रह गई है। जहां एक तरफ सरकारें बड़े उद्योगपतियों को एक रुपये की टोकन मनी पर करोड़ों की जमीनें और तमाम सुविधाएं थाली में सजाकर दे रही हैं, वहीं देश की रीढ़ कहे जाने वाले छोटे व्यापारी (SMEs) और नए स्टार्टअप्स कौड़ीकौड़ी के लिए मोहताज हैं।

पूंजीपतियों की तिजोरी बनाम युवाओं का सपना

सरकारी गलियारों में बैठेसफेदपोशनेता और भ्रष्ट अधिकारियों का एक ऐसा गठजोड़ बन चुका है, जो केवल उन उद्योगपतियों के सामने नतमस्तक रहता है जिनसे उन्हें निजी लाभ की उम्मीद होती है। अपने ईमान को चंद सिक्कों के लिए गिरवी रखकर ये अधिकारी उन छोटे उद्यमियों की राह में कांटों की बाड़ लगा देते हैं, जो वास्तव में रोजगार पैदा करना चाहते हैं।

तल्ख सवाल: यदि बड़े उद्योगपतियों को सस्ती जमीन दी जा सकती है, तो लाखों घरों का चूल्हा जलाने वाले छोटे स्टार्टअप्स को महंगी जमीन और जटिल कागजी कार्यवाही के जाल में क्यों फंसाया जाता है?

जब रोजगार देने वाला ही बेरोजगार हो जाए

एक छोटा स्टार्टअप या स्थानीय उद्योग केवल एक व्यक्ति का सपना होता है, बल्कि उससे हजारों परिवारों का जीवन यापन चलता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी जमीन पाने के लिए एक छोटे उद्यमी को चप्पलें घिसनी पड़ती हैं। उसे बाजार भाव से कहीं अधिक दाम पर जमीन खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उसकी पूरी पूंजीजमीन और सेटअपमें ही खत्म हो जाती है। परिणामतः, नवाचार (Innovation) शुरू होने से पहले ही दम तोड़ देता है।

क्या फिर होगाजेपी आंदोलनका शंखनाद?

इतिहास गवाह है कि जबजब सत्ता और पूंजी का गठजोड़ आम आदमी के अधिकारों का हनन करता है, तबतब क्रांति का जन्म होता है। आज के हालात 1970 के दशक के उस दौर की याद दिला रहे हैं, जब जयप्रकाश नारायण (JP) ने व्यवस्था के खिलाफ हुंकार भरी थी।

आज का छोटा व्यापारी और शिक्षित युवा वर्ग पूछ रहा हैव्यापारियों के सत्याग्रह की क्रांति कब आएगी? वह उबाल कब दिखेगा जो भ्रष्टाचार की इस नींव को हिला कर रख देगा? छोटे व्यापारियों के मन में सुलग रही यह आग किसी बड़े जनांदोलन का संकेत दे रही है।

सुधार की जरूरत, नहीं तो होगा विद्रोह

अगर सरकारें वास्तव मेंआत्मनिर्भर भारतका सपना देखती हैं, तो उन्हें अपनी नीतियां बदलनी होंगी। जमीन के आवंटन में पारदर्शिता लानी होगी और स्टार्टअप्स को भी उसी दर पर संसाधन उपलब्ध कराने होंगे जिस दर पर बड़े घरानों को दिए जाते हैं। यदि छोटे उद्यमियों का यहदमननहीं रुका, तो आने वाले समय में आर्थिक न्याय के लिए एक बड़ाव्यापारी सत्याग्रहअपरिहार्य है।

 

gaurav
Author: gaurav

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