
विशेष खोजी रिपोर्ट: शेयर बाजार की चमक या बर्बादी का संकेत?
नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार (NSE और BSE) इन दिनों नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। हर दूसरे दिन एक नया IPO (Initial Public Offering) बाजार में दस्तक देता है और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये निवेशकों की जेब से निकलकर कंपनियों के पास चले जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि क्या वास्तव में देश में इतनी औद्योगिक क्रांति आ गई है? या फिर यह चंद पूंजीपतियों द्वारा बुना गया एक ऐसा मकड़जाल है, जिसमें देश का आम नागरिक फंसता जा रहा है?
1. शेल कंपनियों का ‘अदृश्य‘ साम्राज्य
बाजार के जानकारों के बीच यह चर्चा तेज है कि कई बड़ी कंपनियां अपनी ‘सब्सिडियरी‘ या ‘शेल कंपनियां‘ बनाकर उन्हें बाजार में लिस्ट करा रही हैं। यह एक ही सिक्के के कई पहलुओं जैसा है—चेहरा नया, लेकिन मालिक वही पुराने 10-12 रसूखदार पूंजीपति। एक ही व्यापार को दस छोटे टुकड़ों में बांटकर लिस्ट करना न केवल कृत्रिम तेजी (Artificial Boom) पैदा करता है, बल्कि बाजार की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है।
2. आम नागरिक: निवेश या बलि का बकरा?
जब बाजार ऊपर जाता है, तो बड़े खिलाड़ी अपना मुनाफा लेकर निकल जाते हैं। लेकिन जैसे ही यह ‘बबल‘ या गुब्बारा फूटता है, सबसे ज्यादा चोट उस आम भारतीय को लगती है जिसने अपनी जीवन भर की कमाई इस उम्मीद में लगा दी थी कि उसका भविष्य सुरक्षित होगा। क्या यह आम आदमी के साथ एक सोची–समझी साजिश है?
3. सरकार और नियामक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल
देश के संसाधनों और जनता के पैसे की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार और SEBI जैसी संस्थाओं की है। यदि बिना किसी ठोस आधार के कंपनियां लिस्ट हो रही हैं और बाजार को ‘मैन्युपुलेट‘ किया जा रहा है, तो यह केवल आर्थिक चूक नहीं, बल्कि देश के साथ विश्वासघात है।
क्या चंद अरबपतियों की संपत्ति बढ़ाने के लिए पूरे देश की अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाया जा रहा है?
4. कब उठेगा और कब गिरेगा बाजार?
बाजार का उतार–चढ़ाव अब व्यापारिक प्रदर्शन पर कम और ‘सट्टेबाजी‘ व ‘क्रोनिक कैपिटलिज्म‘ पर ज्यादा निर्भर दिखने लगा है। जब बड़े मगरमच्छों को माल बेचना होता है, तो खबरें सकारात्मक दिखाई जाती हैं, और जब वे अपना हिस्सा निकाल लेते हैं, तो बाजार को धड़ाम से गिरा दिया जाता है।
सावधान रहने का वक्त
यह समय केवल लाभ देखने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि क्या यह विकास वास्तविक है। यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाले समय में यह आर्थिक असमानता देश की जड़ों को खोखला कर सकती है। शेयर बाजार को ‘पूंजीपतियों का जुआ‘ बनने से रोकना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।


