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सत्ता के ‘हंटर’ या पूंजीपतियों के ‘चौकीदार’? क्या ED, CBI और IT सिर्फ विपक्ष और उभरते व्यापार को कुचलने के हथियार हैं?

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में ED (प्रवर्तन निदेशालय), CBI (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं को भ्रष्टाचार के विरुद्धसुरक्षा कवचमाना गया था। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में एक गहरा और डरावना सवाल खड़ा हो रहा है: क्या ये संस्थाएं अब देश की नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा राजनेताओं और बड़े पूंजीपतियों कीनिजी जागीरबन चुकी हैं?

उभरते व्यापारियों कीघेराबंदीऔर सिंडिकेट का खेल

बाजार में एक कड़वा सच चर्चा का विषय बना हुआ है कि जैसे ही कोई छोटी कंपनी या स्टार्टअप अपनी मेहनत से आगे बढ़ने लगता है और स्थापितकॉर्पोरेट दिग्गजोंके साम्राज्य को चुनौती देने लगता है, अचानक उन पर केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा कसने लगता है।

1.          चुनिंदा कार्रवाई: सवाल उठता है कि क्या ये छापे भ्रष्टाचार मिटाने के लिए हैं या उभरते हुए प्रतिद्वंद्वी को खत्म करने के लिए?

2.        पूंजीपतियों का हित: क्या अधिकारी उनपूंजीपतियोंके इशारे पर काम कर रहे हैं जो बाजार में एकाधिकार (Monopoly) चाहते हैं? 

3.        दबाव की राजनीति: GST और बैंक नोटिसों का जाल बुनकर छोटे व्यापारियों को मानसिक और आर्थिक रूप से पंगु बनाने की रणनीति अब किसी से छिपी नहीं है।

एजेंसियों का बदलता चरित्र: निष्पक्षता या गुलामी?

आंकड़े गवाह हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इन एजेंसियों की सक्रियता का ग्राफ राजनीतिक विरोधियों और गैररसूखदार व्यापारियों की ओर ही मुड़ा है। जब कोई नेता या व्यापारी सत्ता के संरक्षण में जाता है, तो उसके सारेपापधुल जाते हैं, लेकिन जो सिर उठाकर व्यापार करना चाहता है, उसके दरवाजे पर ED की दस्तक निश्चित हो जाती है।

लोकतंत्र तब खतरे में पड़ता है जब जांच एजेंसियां कानून की रक्षा करने के बजाय सत्ता और संपत्ति के रखवालों कीप्राइवेट आर्मीकी तरह व्यवहार करने लगती हैं।

क्या यहसंवैधानिक भ्रष्टाचारहै?

अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल इस ओर इशारा करते हैं कि फाइलें ऊपर से मिलने वाले आदेशों के आधार पर खुलती और बंद होती हैं। बैंक लोन की बंदरबांट से लेकर GST की छापेमारी तक, एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया गया है जिसमें केवल वही जीवित रह सकता है जोसिस्टमके आगे घुटने टेक दे।

यदि आज इन संस्थाओं की साख को नहीं बचाया गया, तो भारत का आम उद्यमी और ईमानदार करदाता खुद को असहाय महसूस करेगा। यह लड़ाई सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य और निष्पक्ष न्याय प्रणाली की है।

gaurav
Author: gaurav

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