
विशेष रिपोर्ट: मुफ्त की योजनाओं का बोझ या विकास की रफ्तार? मध्य प्रदेश की आर्थिक सेहत का पूरा सच
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय एक बड़ा सवाल गूँज रहा है—क्या राज्य “कल्याणकारी योजनाओं” और “कर्ज के जाल” के बीच फंस गया है? पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में शुरू की गई लोकलुभावन योजनाओं, विशेषकर ‘लाड़ली बहना योजना‘, ने जहां चुनाव में भाजपा को बंपर जीत दिलाई, वहीं अब मोहन यादव सरकार के लिए यह वित्तीय चुनौती बनती जा रही है।
शिवराज सरकार की नीतियां और बढ़ता कर्ज
पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश सरकार ने अपनी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए बाजार से भारी कर्ज लिया है। आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज ₹3.75 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है। आलोचकों का तर्क है कि ‘मुफ्त की रेवड़ी‘ (Freebies) की संस्कृति ने राज्य के खजाने पर वह दबाव डाल दिया है जिसे संभालना अब मुश्किल हो रहा है।
लाड़ली बहना योजना: हर महीने करोड़ों महिलाओं के खाते में राशि डालना एक बड़ा वित्तीय भार है।
ब्याज का चक्र: राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहा है।
मोहन सरकार की दुविधा: रोजगार बनाम मुफ्त योजनाएं
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है। एक तरफ वह युवाओं को रोजगार और औद्योगिक विकास देना चाहते हैं, जिसके लिए भारी निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। दूसरी तरफ, पुरानी योजनाओं को बंद करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
युवाओं पर असर: राज्य के युवाओं का आरोप है कि सरकार के पास नई नियुक्तियों और भर्ती परीक्षाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए फंड की कमी है। जब बजट का बड़ा हिस्सा ‘मुफ्त वितरण‘ में चला जाता है, तो उद्योगों को मिलने वाली सब्सिडी और नए स्वरोजगार कार्यक्रमों के लिए पैसा कम बचता है।
“सरकार को यह तय करना होगा कि वह ‘मछली खिलाना‘ चाहती है या ‘मछली पकड़ना सिखाना‘। स्थायी रोजगार ही मध्य प्रदेश के भविष्य को बचा सकता है।” – आर्थिक विशेषज्ञ
पुरानी नीतियों ने किया ‘बंटाधार‘?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पिछली सरकारों की “खर्च करो और कर्ज लो” की नीति ने राज्य की अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर कर दी है। सरकारी खजाने पर बढ़ते बोझ के कारण विकास कार्य (Capital Expenditure) प्रभावित हो रहे हैं। सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनाने के बजाय पैसा सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर हो रहा है, जिससे दीर्घकालिक संपत्ति (Long-term assets) का निर्माण नहीं हो पा रहा है।
क्या है समाधान?
मोहन यादव सरकार को यदि मध्य प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाना है, तो उसे कुछ कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं:
- योजनाओं की समीक्षा: केवल पात्र और अत्यंत जरूरतमंदों को ही आर्थिक सहायता मिले।
- औद्योगिक निवेश: कर्ज के पैसे को उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लगाना ताकि राजस्व बढ़े।
- रोजगार सृजन: भर्ती प्रक्रियाओं में तेजी लाना ताकि युवा उत्पादक बन सकें।
मध्य प्रदेश का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार ‘लोकप्रियता‘ और ‘राजकोषीय अनुशासन‘ के बीच तालमेल कैसे बिठाती है।

