
भोपाल। लोकतंत्र की परिभाषा है— “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन।” लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री आवास (CM House) के इर्द-गिर्द बुना गया तंत्र कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। पिछले दो वर्षों से प्रदेश का आम आदमी अपने ही चुने हुए मुखिया से मिलने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, लेकिन ‘साहब‘ तक पहुंचना अब एवरेस्ट फतह करने जैसा दुष्कर हो गया है।
बिचौलियों और भ्रष्टाचार का मकड़जाल
सूत्रों और पीड़ित जनता के आक्रोश से यह बात सामने आ रही है कि मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द तैनात छोटे कर्मचारियों से लेकर बड़े अधिकारियों तक ने एक ऐसा ‘फिल्टर‘ लगा दिया है, जिसे पार करना बिना ‘लोभ-लालच‘ या रसूख के मुमकिन नहीं है। आरोप है कि बिना किसी स्वार्थ या सेटिंग के एक सामान्य नागरिक की अर्जी मुख्यमंत्री की मेज तक तो क्या, गेट के अंदर तक नहीं पहुंच पाती।
नकारात्मक फीडबैक का खेल: अपनों को दूर रखने की साजिश
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि यदि कोई साधारण व्यक्ति संघर्ष करके मुख्यमंत्री के करीब पहुंच भी जाए, तो वहां तैनात तंत्र उसकी छवि को धूमिल करने में जुट जाता है। अपने निजी स्वार्थों और ‘कमीशन‘ के चक्कर में, अधिकारी मुख्यमंत्री को गुमराह करते हैं और जनता के वास्तविक मुद्दों को नकारात्मक फीडबैक देकर दबा दिया जाता है। चिंतन इस बात पर नहीं होता कि समस्या कैसे सुलझे, बल्कि इस पर होता है कि “कोई आम आदमी मुख्यमंत्री तक दोबारा कैसे न पहुंच पाए।”
क्या यही है असली लोकतंत्र?
एक तरफ सरकार ‘जनसेवा‘ के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री निवास के भीतर पनप रहा यह ‘सिंडिकेट‘ लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री को इस बात की खबर है कि उनके नाम पर जनता को छला जा रहा है? या फिर प्रशासन ने जानबूझकर मुख्यमंत्री को एक ‘काल्पनिक सुरक्षा घेरे‘ में कैद कर दिया है ताकि उनका भ्रष्टाचार निर्बाध चलता रहे?
बदलाव की दरकार
मध्य प्रदेश की जनता अब सवाल पूछ रही है— क्या मुख्यमंत्री सिर्फ रसूखदारों और बिचौलियों के लिए हैं? यदि यही स्थिति रही, तो शासन और जनता के बीच का यह संवादहीनता का गड्ढा आने वाले समय में एक बड़ी राजनीतिक खाई बन सकता है। समय आ गया है कि इन भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों पर नकेल कसी जाए और मुख्यमंत्री कार्यालय के दरवाजे वास्तव में ‘आम जन‘ के लिए खोले जाएं।

