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महा-खुलासा: ‘चंदे’ का चक्रव्यूह और लोकतंत्र का ‘डिजिटल’ पहरा!

₹3112 करोड़ की चुनावी संजीवनी‘: क्या यह देशहित की शक्ति है या नैरेटिवसेट करने वाली विशालकाय मशीन?

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक ऐसा आंकड़ा उभरा है जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता की चौपालों तक हलचल मचा दी है। इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को प्राप्त हुआ ₹3811 करोड़ का चंदा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उन अनसुलझे सवालों का पुलिंदा है, जो भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

चंदे का गणित और देशहितका तर्क

सत्ता पक्ष का दावा है कि यह विशाल धनराशि राष्ट्र निर्माण और संगठन के विस्तार के लिए है। लेकिन आलोचकों और जागरूक जनता के मन में यह गहरा सवाल कौंध रहा है: ऐसा कौन सा देशहितका गुप्त कार्य है, जिसके लिए कॉरपोरेट जगत अपनी तिजोरियाँ केवल एक ही दल के लिए खोल देता है? भाजपा का तर्क रहता है कि वे अंत्योदय और बुनियादी ढांचे के विकास के संकल्प के साथ काम कर रहे हैं, लेकिन विपक्ष इसे क्रोनी कैपिटलिज्मया सांठगांठ वाली राजनीति का नाम देता है।

साइबर सेल और माइंड गेम‘: कैसे बदल दी जाती है आपकी सोच?

इस चंदे का एक बड़ा हिस्सा जिस अदृश्य युद्धमें खर्च होता है, वह है—सोशल मीडिया और साइबर सेल

  • नैरेटिव बिल्डिंग: भाजपा और आरएसएस का विशाल साइबर नेटवर्क जनता के मानस पटल पर इस कदर हावी है कि सत्यऔर प्रचारके बीच की रेखा धुंधली हो गई है।
  • मुंहबोली पब्लिसिटी (Mouth Publicity): तकनीक और जमीनी कार्यकर्ताओं के समन्वय से एक ऐसा तंत्र तैयार किया गया है, जो चौबीसों घंटे यह तय करता है कि आपको क्या सोचना है और किसे देशद्रोहीया अक्षममानना है।
  • विपक्ष पर प्रहार: डिजिटल संसाधनों का उपयोग करके विपक्षी दलों की छवि को इस तरह धूमिल किया जाता है कि विकल्पहीनता की स्थिति पैदा हो जाए।

लोकतंत्र में चंदाया धंधा‘?

इतिहास गवाह है कि जिस पार्टी के पास सबसे ज्यादा संसाधन होते हैं, चुनावी रणभूमि में उसकी गर्जना उतनी ही तीव्र होती है। जनता यह भली-भांति जानती है कि इलेक्टोरल बॉन्ड और ट्रस्ट के पीछे के दानदाता अक्सर पर्दे के पीछे रहते हैं।

बड़ा सवाल: क्या यह चंदा वाकई जन-कल्याण के लिए है, या यह करोड़ों देशवासियों की सोच को कंट्रोलकरने वाली एक सुनियोजित डिजिटल घेराबंदी का ईंधन है?

लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है, बल्कि यह पूछने का भी नाम है कि सत्ता के शिखर पर बैठी पार्टी की चमक के पीछे किसका पसीना है और किसका पैसा। ₹3811 करोड़ का यह आंकड़ा पारदर्शी राजनीति की मांग कर रहा है।

 

gaurav
Author: gaurav

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