
मध्य प्रदेश की राजनीति में अब ‘भावुकता’ और ‘घोषणाओं’ का दौर बीत चुका है। गलियारों में चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस ‘रेवड़ी कल्चर’ से प्रदेश की तिजोरी खाली की थी, अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव उस मलबे पर विकास की ‘बुलेट ट्रेन’ दौड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। सवाल तीखा है: क्या शिवराज के दौर में हुआ बेहिसाब खर्च प्रदेश की प्रगति के लिए ‘ब्रेक’ बन गया था?
1. ‘लाड़ली बहना‘ की चमक में छिपा कर्ज का अंधेरा?
शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में ‘मामा’ की छवि चमकाने के लिए सरकारी खजाने के दरवाजे ऐसे खोले गए कि मध्य प्रदेश ₹4 लाख करोड़ के कर्ज के नीचे दब गया। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि शिवराज का पूरा फोकस ‘वोट बैंक’ को साधने वाली डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं पर था, जिसने लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकारी मदद का मोहताज बना दिया।
इसके विपरीत, डॉ. मोहन यादव ने आते ही संकेत दे दिए हैं कि वे केवल ‘हाथ में पैसा’ देने के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि ‘हाथ में काम’ देने के विजन पर चल रहे हैं। जहां शिवराज ‘चुनावी रेवड़ियों’ में उलझे रहे, वहीं मोहन यादव ‘रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव’ (RIC) के जरिए उद्योगपतियों को प्रदेश में लाकर रोजगार की नई फसल उगाने की कोशिश कर रहे हैं।
2. राजस्व वृद्धि बनाम सरकारी फिजूलखर्ची
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मोहन यादव जैसा विजन 10 साल पहले लागू होता, तो आज मध्य प्रदेश को नया कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ती। शिवराज के समय में बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने और मुफ्त की योजनाओं में स्वाहा हो जाता था।
डॉ. मोहन यादव अब ‘राजस्व आत्मनिर्भरता’ का कठोर अनुशासन लागू कर रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि योजनाओं के नाम पर ‘अपात्रों’ को पालने का वक्त खत्म हो गया है। मोहन मॉडल का सीधा मंत्र है | “उद्योग लगाओ, टैक्स कमाओ और प्रदेश बनाओ।” यह शिवराज के उस मॉडल पर तमाचा है, जिसने राज्य को कर्ज के अंतहीन जाल में धकेल दिया था।
3. ‘बीमारू‘ से ‘विकसित‘ होने की छटपटाहट
इसमें कोई दो राय नहीं कि शिवराज ने मध्य प्रदेश को ‘बीमारू’ के टैग से बाहर निकाला, लेकिन उनकी रफ्तार बैलगाड़ी जैसी थी, जो सिर्फ सरकारी विज्ञापनों में ही तेज दिखती थी। डॉ. मोहन यादव जिस ‘स्पीड’ और ‘टेक्नोलॉजी’ की बात कर रहे हैं, वह प्रदेश को ग्लोबल मैप पर ले जाने की क्षमता रखती है।
मुख्यमंत्री यादव का फोकस आईटी पार्क्स और इंडस्ट्रियल हब पर है, ताकि मध्य प्रदेश की पहचान केवल ‘खेती-किसानी’ तक सीमित न रहे। मोहन यादव का यह कड़ा स्टैंड बताता है कि वे प्रदेश की किस्मत बदलने के लिए कड़वे फैसले लेने से भी नहीं कतराएंगे, भले ही इसके लिए शिवराज युग की ‘लोकप्रिय’ लेकिन ‘खर्चीली’ परंपराओं को क्यों न तोड़ना पड़े।
‘फ्री‘ की राजनीति पर ‘काम‘ की राजनीति का प्रहार
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश अब ‘मामा’ की पुरानी लीक से हटकर ‘मोहन’ की नई राह पर है। जनता अब समझ रही है कि केवल खजाना खाली करने वाली योजनाओं से भविष्य नहीं संवरता। डॉ. मोहन यादव का ‘इन्वेस्टमेंट मॉडल’ अगर जमीन पर उतरता है, तो वे प्रदेश के इतिहास में उस जननायक के रूप में दर्ज होंगे जिसने मध्य प्रदेश को कर्ज की जंजीरों से आजाद कराया

