भोपाल। मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक अजीब सा सन्नाटा और सुगबुगाहट दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। सत्ता के शीर्ष सोपानों में चर्चा है कि एक ‘बड़े साहब‘ (प्रमुख सचिव) अपनी ही मातहत ‘मैडम‘ (सचिव स्तर की आईएएस अधिकारी) की कार्यप्रणाली से खासे व्यथित हैं। आलम यह है कि बैठकों में दिए गए निर्देशों और धरातल पर होने वाले कार्यों के बीच की खाई गहरी होती जा रही है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: प्राथमिकता पर भारी पड़ती सुस्ती
सूत्रों की मानें तो यह पूरा मामला उन दो विभागों से जुड़ा है, जिनका सीधा सरोकार आम जनता की बुनियादी जरूरतों— शिक्षा और स्वास्थ्य से है। शासन की प्राथमिकता सूची में ये दोनों ही विभाग शीर्ष पर हैं। ‘बड़े साहब‘ चाहते हैं कि इन दोनों महकमों के बीच बेहतर तालमेल (Coordination) हो ताकि योजनाओं की ‘डिलीवरी‘ प्रभावी ढंग से हो सके।
हालाँकि, हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। बैठकों के दौरान ‘मैडम‘ बड़े साहब की हर बात पर सहमति की मुहर तो लगा देती हैं, लेकिन जब बात ठोस कदम उठाने की आती है, तो फाइलें रेंगने लगती हैं।
तालमेल का अभाव या मूक विरोध?
प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा गरम है कि आखिर ‘मैडम‘ की इस कार्यशैली के पीछे की वजह क्या है?
- अधूरी टास्क रिपोर्ट: बैठकों में सौंपे गए कार्य समय सीमा के भीतर पूरे नहीं हो रहे हैं।
- दिखावे की सहमति: चर्चा है कि मैडम सामने तो ‘हाँ‘ कह देती हैं, लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर ‘शून्य‘ की स्थिति बनी रहती है।
- समन्वय का संकट: शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभागों के बीच जिस पुल की जरूरत है, वह फिलहाल टूटता नजर आ रहा है।
क्या ‘बड़े साहब‘ लेंगे कड़ा एक्शन?
अब सवाल यह उठता है कि क्या मध्यप्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में कोई नई रीत चल पड़ी है, जहाँ वरिष्ठों के निर्देशों की इस तरह अनदेखी की जा रही है? क्या ‘बड़े साहब‘ अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए अब ‘एक्शन मोड‘ में आएंगे या फिर व्यवस्था इसी तरह रेंगती रहेगी?
जानकारों का कहना है कि अगर जल्द ही स्थितियों में सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर सरकार की छवि और जनता को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ेगा। अब देखना यह है कि ‘बड़े साहब‘ का धैर्य कब तक जवाब देता है और क्या शासन स्तर पर कोई बड़ी सर्जरी देखने को मिलेगी।

