
भोपाल। कहने को तो मध्य प्रदेश ‘गजब’ है, लेकिन इस गजब राज्य की सबसे कड़वी सच्चाई यहां की पत्थर दिल ब्यूरोक्रेसी है। वल्लभ भवन की ऊंची इमारतों में बैठे ‘साहबों’ के लिए आम आदमी और छोटा व्यापारी सिर्फ एक फाइल का नंबर है। अगर आप एक युवा उद्यमी हैं और आपके पास कोई बड़ा राजनीतिक रसूख नहीं है, तो समझ लीजिए कि आपका पाला एक ऐसी दीवार से पड़ा है जिसे लांघना नामुमकिन है।
एसी कमरों में कैद ‘संवेदनहीन’ हुक्मरान
प्रिंसिपल सेक्रेटरी (PS) और एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (ACS) लेवल के अधिकारियों तक पहुंचना तो दूर, उनके चपरासियों की नजरें पार करना भी किसी जंग जीतने जैसा है। एक छोटा व्यापारी या युवा स्टार्टअप फाउंडर जब अपने सपनों को लेकर इन दफ्तरों के चक्कर लगाता है, तो उसे मदद के बजाय ‘कल आना’ या ‘उधर जाइए’ का झुनझुना थमा दिया जाता है।
इन अधिकारियों की रगों में मानवता और संवेदना पूरी तरह सूख चुकी है। ये भूल चुके हैं कि ये जनता के सेवक हैं, स्वामी नहीं। इनकी सोच में एक ‘आम आदमी’ को आगे बढ़ते देखने की खुशी नहीं, बल्कि उसे दबाए रखने की एक अघोषित जलन झलकती है।
युवाओं का भविष्य ‘लाल फीताशाही’ की भेंट
मुख्यमंत्री मंचों से स्वरोजगार और उद्यमशीलता की बात करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब कोई युवा किसी समस्या को लेकर इन तथाकथित ‘दिग्गज अधिकारियों’ के पास जाता है, तो उसकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है। उनकी आंखों में युवाओं के लिए कोई सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सी अकड़ और बेरुखी होती है।
- अपॉइंटमेंट का खेल: महीनों तक चक्कर काटने के बाद भी अधिकारी ‘मीटिंग’ में व्यस्त रहते हैं।
- घुमाने की कला: एक विभाग से दूसरे विभाग, एक टेबल से दूसरी टेबल—आम आदमी का जूता घिस जाता है लेकिन काम नहीं होता।
- मानवता का अभाव: छोटे आदमी की पीड़ा इन अधिकारियों के लिए सिर्फ एक शोर है, जिसे वे अपने केबिन के मोटे दरवाजों से बाहर ही रखना पसंद करते हैं।
क्या यह ‘अहंकार’ ही एमपी का विकास रोकेगा?
मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी आज एक ऐसा टापू बन चुकी है, जहां सिर्फ रसूखदारों का स्वागत है। छोटे व्यापारियों और युवाओं के प्रति इन अधिकारियों का रवैया केवल निंदनीय नहीं, बल्कि शर्मनाक है। जब तक वल्लभ भवन के इन ‘किलेदारों’ की सोच नहीं बदलेगी और इनके मन से छोटे आदमी के प्रति हीन भावना और जलन खत्म नहीं होगी, तब तक प्रदेश का युवा खुद को ठगा हुआ ही महसूस करेगा।

