राजभवन या ‘सियासत का अखाड़ा’? महामहिम की चौखट पर कर्मठों को ‘नो एंट्री’, जातिवादियों की ‘रेड कार्पेट’ एंट्री!

भोपाल। मध्यप्रदेश का गौरवशाली राजभवन, जो कभी संवैधानिक मर्यादाओं और सादगी का प्रतीक माना जाता था, आज विवादों के घेरे में है। गलियारों में सुगबुगाहट नहीं, बल्कि शोर है कि यह ऐतिहासिक इमारत अब जनसेवा का केंद्र न रहकर जातिवाद का अड्डा और पावर पॉलिटिक्स की नर्सरी बन चुकी है।

प्रतिभा का अपमान, चाटुकारिता का सम्मान?

हैरानी की बात यह है कि प्रदेश का मान बढ़ाने वाले, समाज के लिए पसीना बहाने वाले और निस्वार्थ सेवा करने वाले कर्मठ लोगों को राज्यपाल से मिलने के लिए महीनों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कई बार तो उनकी फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। लेकिन, जैसे ही कोई जातिगत समीकरण बिठाने वाला नेता या सत्ता की मलाई चखने वाला रसूखदार शख्स आता है, राजभवन के दरवाजे पलक झपकते ही खुल जाते हैं।

अंदर की कड़वी हकीकत:

·         संवैधानिक गरिमा पर सवाल: क्या राजभवन अब केवल खास वर्ग और खास विचारधारा के पावर ब्रोकर्सके लिए सुरक्षित चारागाह बन गया है?

·         आमजन की उपेक्षा: एक तरफ आम आदमी न्याय और मार्गदर्शन की उम्मीद में बाहर खड़ा रहता है, वहीं दूसरी ओर अंदर जातिवादी लामबंदीकी बिसात बिछाई जाती है।

·         समय की बंदरबांट: आरोप है कि राज्यपाल के पास अच्छे काम करने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए चंद मिनट नहीं हैं, लेकिन सियासी गोटियांफिट करने वालों के साथ घंटों चाय की चुस्कियां ली जा रही हैं।

जब संवैधानिक संस्थाएं योग्यता के बजाय जाति और रसूख को पैमाना मानने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के मंदिर में दीमक लग चुका है।”

जनता में आक्रोश

राजभवन की इस कार्यप्रणाली ने बौद्धिक वर्ग और समाजसेवियों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब राजभवन से निकलने वाले निर्णय लोकहित में होंगे या फिर उन चंद लोगों के इशारे पर, जो दिन-रात वहां अपनी सियासी रोटियां सेंकने में मशगूल हैं?

यदि जल्द ही इस पावर पॉलिटिक्सके अड्डे की छवि को नहीं सुधारा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता का इस सर्वोच्च पद से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा।

  • gaurav singh rajput

    gaurav singh rajput

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