इंदौर में मातम, शिक्षा का बुरा हाल: राजभवन में ‘खामोशी’ और प्रदेश में ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’!

इन्दौर की त्रासदी और बदहाल शिक्षा तंत्र पर महामहिम की चुप्पी ने खड़े किए गंभीर सवाल; क्या केवल लाल कालीन और जातिवाद तक सीमित रह गया है राज्यपाल का पद?

भोपाल/इन्दौर: मध्य प्रदेश के व्यावसायिक केंद्र इंदौर में दूषित पानी पीने से 18 से अधिक मासूम जानों का जाना और 400 से ज्यादा लोगों का अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जूझना, किसी त्रासदी से कम नहीं है। लेकिन विडंबना देखिए, प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख यानी राज्यपाल महोदय के कानों तक शायद इन चीखों की गूँज नहीं पहुँची है। आज जनता पूछ रही है कि क्या राजभवन की चारदीवारी इतनी ऊँची हो गई है कि बाहर का मातम दिखाई नहीं देता?

राजशाही नहीं, जनसेवा का पद है यह!

आज के लोकतांत्रिक युग में राज्यपाल का पद किसी ‘राजा’ का नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक और जन-कल्याण का है। लेकिन मध्य प्रदेश के मौजूदा हालात को देखकर ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा‘ वाली कहावत सटीक बैठती है। जब प्रदेश की जनता बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है और दूषित पानी से दम तोड़ रही है, तब राजभवन में लाल कालीन बिछाकर रसूखदारों की खातिरदारी और जातिगत समीकरणों को साधने का खेल शोभा नहीं देता।

विश्वविद्यालयों का बुरा हाल: कहाँ गई शिक्षा की गरिमा?

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मध्य प्रदेश का ग्राफ लगातार गिर रहा है। एक समय था जब सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए छात्र दिन-रात एक कर देते थे, लेकिन आज:

  • प्रोफेसरों का अभाव: न पर्याप्त शिक्षक हैं, न पढ़ाने की मंशा।
  • खाली कैंपस: छात्र अब इन विश्वविद्यालयों से मुंह मोड़ रहे हैं।
  • प्रशासनिक अनदेखी: कुलाधिपति (Chancellor) होने के नाते राज्यपाल की जिम्मेदारी है कि वे शिक्षा के गिरते स्तर को संभालें, लेकिन उनके पास इन ‘मामूली’ चीजों के लिए समय ही नहीं है।

मध्य प्रदेश से बढ़ती दूरी?

ऐसा प्रतीत होता है जैसे राज्यपाल महोदय का मध्य प्रदेश की मिट्टी और यहाँ की जनता के दुखों से कोई सरोकार ही नहीं रह गया है। यदि एक संवैधानिक प्रमुख संकट के समय जनता के बीच न खड़ा हो सके और न ही कड़े प्रशासनिक कदम उठा सके, तो उस पद की गरिमा धूमिल होती है।

“समाज जन-कल्याण से ही इस पदवी की शोभा बढ़ेगी, न कि बंद कमरों में की गई राजनीति से।”

अगर हालात यही रहे, तो प्रदेश का स्तर गिरता जाएगा और आने वाली पीढ़ियां इस ‘मौन’ के लिए इतिहास से सवाल पूछेंगी। अब समय आ गया है कि राजभवन अपनी नींद से जागे और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही तय करे।

  • gaurav singh rajput

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