
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बीते महीनों में लगभग आठ बार फोन पर बातचीत होने की जानकारी सामने आई है। इन वार्ताओं में दोनों नेताओं ने सुरक्षा, व्यापार, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और रणनीतिक सहयोग जैसे कई विषयों पर चर्चा की।
लेकिन इस तरह की कॉल सिर्फ एक साधारण फोन कॉल नहीं होती। दो देशों के राष्ट्राध्यक्ष जब एक-दूसरे से संवाद करते हैं तो इसके लिए एक निश्चित कूटनीतिक प्रोटोकॉल और सुरक्षा ढांचा तय होता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि बातचीत सुरक्षित, आधिकारिक और रिकॉर्ड में रहे।
📌 फोन कॉल कैसे सेट होती है?
दो देशों के शीर्ष नेताओं की कॉल पहले से तय समय-सारणी के अनुसार होती है। इसके लिए:
- विदेश मंत्रालय के अधिकारी
- राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
- दूतावास
- और प्रोटोकॉल विभाग
आपसी समन्वय करके कॉल की तारीख और समय को तय करते हैं।
📌 कॉल में कौन होता है शामिल?
हालाँकि बात केवल दो नेताओं के बीच होती है, लेकिन पर्दे के पीछे पूरी टीम सक्रिय रहती है, जैसे:
- सुरक्षा विशेषज्ञ
- विदेश नीति सलाहकार
- नोट-टेकर्स (बातचीत का औपचारिक रिकॉर्ड रखने वाले अधिकारी)
कभी-कभी दोनों देशों की प्रेस टीम भी तैयार रहती है ताकि जरूरत पड़ने पर कॉल का आधिकारिक बयान जारी किया जा सके।
📌 बातचीत में क्या-क्या होता है?
ऐसी कॉल्स में सामान्यतः:
- क्षेत्रीय संकट
- रक्षा समझौते
- ऊर्जा सहयोग
- व्यापार नीतियाँ
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन
- और द्विपक्षीय रिश्तों
जैसे विषयों पर बात होती है।
कई बार नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंध भी ऐसे संवाद को प्रभावित करते हैं। ट्रंप और मोदी के बीच भी ऐसे निजी समीकरण की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में होती रही है।
📌 कॉल सुरक्षित कैसे रहती है?
ऐसी कॉल्स एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित लाइनों पर होती हैं, जिन्हें विशेष सरकारी संचार नेटवर्क से जोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य है कि:
✔ कोई तीसरा देश
✔ हैकर
या
✔ निजी संस्थान
कॉल की सामग्री तक न पहुँच सके।
📌 कॉल के बाद क्या होता है?
कॉल समाप्त होने के बाद:
- संबंधित मंत्रालय नोट तैयार करता है
- आधिकारिक बयान जारी होता है (कभी-कभी सीमित)
- और आगे की रणनीति पर काम शुरू हो जाता है
कुछ मामलों में मीडिया के लिए सिर्फ “दो पंक्तियों का बयान” जारी होता है, जबकि असल बातचीत कई विषयों को कवर करती है जो सार्वजनिक नहीं होते।
विशेषज्ञों की राय
विदेश नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि नेताओं के बीच सीधी बातचीत से:
✔ गलतफहमियों में कमी आती है
✔ संबंधों में व्यक्तिगत गर्माहट बढ़ती है
✔ और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलती है

