
भोपाल | विशेष संवाददाता मध्यप्रदेश माध्यम (MP Madhyam) में इन दिनों सब कुछ ‘सामान्य‘ नहीं है। सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार का जिम्मा संभालने वाले इस विभाग ने हाल ही में एम्पैनलमेंट के नाम पर जो ‘टेंडर प्रक्रिया‘ अपनाई है, उसने प्रदेश के पुराने और अनुभवी विज्ञापन एजेंसियों और इवेंट फर्म्स की नींद उड़ा दी है। आरोप है कि विभाग ने सालों से सेवा दे रहे अनुभवी लोगों को तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया है, जबकि बिना किसी ठोस अनुभव वाली नई फर्मों के लिए ‘पिछले दरवाजे‘ खोल दिए गए हैं।
अनुभव को दरकिनार, अपनों पर ‘मेहरबानी‘
हैरानी की बात यह है कि इस नई सूची में ऐसी फर्म्स शामिल हैं, जिनके पास न तो पर्याप्त टर्नओवर है और न ही सरकारी काम का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड। दूसरी ओर, जो एजेंसियां पिछले एक दशक से विभाग के साथ काम कर रही थीं, उन्हें मामूली कागजी आपत्तियों के आधार पर अपात्र घोषित कर दिया गया।
“यह केवल टेंडर नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित सेटिंग है। जिन लोगों ने दिन-रात विभाग के लिए काम किया, आज वे सड़क पर हैं और नई कंपनियां मलाई काटने की तैयारी में हैं।” — एक पीड़ित एजेंसी संचालक
बड़ा सवाल: किस ‘योग्यता‘ पर मिली एंट्री?
विभागीय सूत्रों की मानें तो एम्पैनलमेंट की शर्तों को इस तरह से ‘कस्टमाइज‘ किया गया था कि खास रसूखदार लोग ही इसमें फिट हो सकें।
- अनुभव का पैमाना बदला: सालों का अनुभव रखने वालों को ‘क्राइटेरिया‘ के जाल में उलझाया गया।
- नई फर्मों का उदय: कई ऐसी फर्में पैनल में आ गई हैं, जिनका गठन महज कुछ समय पहले हुआ है?
- पारदर्शिता पर पर्दा: टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता का दावा करने वाला विभाग अब सवालों के घेरे में है।
आक्रोश की लहर: आंदोलन की तैयारी
इस ‘धांधली‘ के खिलाफ बाहर किए गए वेंडर्स और संचालकों में भारी आक्रोश है। चर्चा है कि यह मामला जल्द ही मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और न्यायालय तक पहुंचेगा। माध्यम के गलियारों में दबी जुबान में चर्चा है कि यह पूरा खेल बड़े कमीशन और राजनीतिक दबाव के चलते खेला गया है।
‘माध्यम‘ की कार्यप्रणाली पर उठते 3 बड़े सवाल:
1. पैरामीटर का खेल: जब पुरानी एजेंसियां सक्षम थीं, तो अचानक उन्हें क्यों हटाया गया?
2. बैकडोर एंट्री: बिना अनुभव वाली फर्मों को किस आधार पर ‘ए ग्रेड‘ का काम सौंपने की तैयारी है?
3. रोजगार पर चोट: पुराने वेंडर्स के बाहर होने से उनसे जुड़े सैकड़ों कर्मचारियों के भविष्य पर तलवार लटक गई है।
सरकारी विभागों में एम्पैनलमेंट का उद्देश्य श्रेष्ठ प्रतिभाओं को मौका देना होना चाहिए, न कि बंदरबांट करना। अगर ‘माध्यम‘ अपनी साख बचाना चाहता है, तो उसे इस पूरी प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।







