
स्कूल पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका से जुड़े कथित “ज्यूडीशियल करप्शन” अध्याय को लेकर विवाद बढ़ गया है, जिस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश D Y Chandrachud ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और यह मामला गंभीर प्रतीत होता है। CJI ने संकेत दिया कि अध्याय की सामग्री और उसके संदर्भों की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है तथा वे स्वयं इस मामले की सुनवाई करेंगे।
यह विवाद NCERT की एक पुस्तक में कथित रूप से शामिल उस अध्याय से जुड़ा है जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पाठ्य सामग्री में संस्थान की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले कथन हैं और तथ्यात्मक संतुलन का अभाव है। दूसरी ओर, शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नागरिक शास्त्र में संस्थागत जवाबदेही और आलोचनात्मक विमर्श का स्थान होना चाहिए, बशर्ते सामग्री सटीक और संतुलित हो।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI ने टिप्पणी की कि न्यायपालिका पर अविश्वास पैदा करने वाली सामग्री को बिना ठोस आधार के शामिल करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि अध्याय का उद्देश्य शिक्षा है तो उसे तथ्य, संदर्भ और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर संबंधित अंशों की समीक्षा या संशोधन के निर्देश दिए जा सकते हैं।
यह मामला शिक्षा सामग्री में संस्थाओं की आलोचना की सीमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम संस्थागत सम्मान के संतुलन की बहस को सामने लाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल पाठ्यक्रम में संवेदनशील विषयों को शामिल करते समय अकादमिक निष्पक्षता, प्रमाणिकता और संतुलित प्रस्तुति बेहद महत्वपूर्ण है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर है, जो शिक्षा और संस्थागत छवि दोनों के लिए मिसाल तय कर सकता है।









