
NCERT की एक पाठ्यपुस्तक में शामिल “ज्यूडीशियल करप्शन” शीर्षक वाले चैप्टर को लेकर देशभर में विवाद खड़ा हो गया है। इस अध्याय में न्यायपालिका से जुड़े भ्रष्टाचार पर ऐसे संदर्भ और उदाहरण दिए गए थे, जिन्हें लेकर कानूनी समुदाय और न्यायपालिका के भीतर गंभीर आपत्ति जताई गई। मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट स्तर पर भी चिंता व्यक्त की गई और इसे न्यायपालिका की छवि को प्रभावित करने वाला बताया गया। विवाद बढ़ने पर NCERT ने तुरंत संज्ञान लेते हुए अपनी प्रतिक्रिया जारी की।
NCERT ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि यह सामग्री अनजाने में शामिल हो गई और इसका उद्देश्य किसी संस्था या न्यायपालिका को बदनाम करना नहीं था। परिषद ने स्पष्ट किया कि संबंधित अध्याय को अब पूरी तरह से पुनर्लेखन (रीराइट) किया जाएगा, ताकि सामग्री संतुलित, तथ्यपरक और संस्थागत सम्मान को ध्यान में रखते हुए तैयार हो। साथ ही शैक्षणिक मानकों के अनुरूप संशोधित संस्करण जल्द जारी करने की बात कही गई है।
इस बीच बाजार में वितरित हो चुकी कुल 38 प्रतियों को भी वापस मंगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रकाशन और वितरण चैनलों को निर्देश दिया गया है कि विवादित सामग्री वाली पुस्तकें छात्रों या संस्थानों तक आगे न पहुंचें। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में संवेदनशील विषयों को शामिल करते समय भाषा, संदर्भ और संस्थागत गरिमा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि इनका सीधा प्रभाव छात्रों की सोच और समझ पर पड़ता है।
इस विवाद ने एक बार फिर शैक्षणिक सामग्री की समीक्षा प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाठ्यपुस्तकें केवल जानकारी का स्रोत नहीं बल्कि संस्थाओं के प्रति विश्वास निर्माण का माध्यम भी होती हैं। ऐसे में NCERT द्वारा त्वरित सुधारात्मक कदम उठाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है, ताकि शिक्षा व्यवस्था और न्यायपालिका दोनों की विश्वसनीयता बनी रहे और भविष्य में ऐसी त्रुटियों की पुनरावृत्ति न हो।









