
क्या मोहन सरकार में ‘बलिदान‘ बन गई ब्राह्मणों की ताकत? चापलूसों के दम पर बिछ रही नई बिसात!
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में एक दौर था जब विंध्य से लेकर बुंदेलखंड तक ब्राह्मण नेताओं की तूती बोलती थी। लेकिन आज गलियारों में सवाल तैर रहा है— क्या सूबे की मोहन यादव सरकार में ब्राह्मण नेतृत्व को सोची–समझी रणनीति के तहत किनारे लगाया जा रहा है? नरोत्तम मिश्रा की हार, गोपाल भार्गव की ‘मार्गदर्शक मंडल‘ जैसी स्थिति और वीडी शर्मा के भविष्य को लेकर उठते सवाल क्या किसी बड़े सियासी ‘ऑपरेशन‘ का हिस्सा हैं?
1. कद्दावर चेहरों की खामोशी: त्याग या सियासी घेराबंदी?
नरोत्तम मिश्रा जैसा प्रखर वक्ता और संकटमोचक चेहरा आज सत्ता के मुख्य ढांचे से बाहर है। आठ बार के विधायक गोपाल भार्गव, जिनके अनुभव का कोई सानी नहीं, वे अब केवल बेंच की शोभा बढ़ा रहे हैं। चर्चा आम है कि क्या इन नेताओं को उनके ‘ब्राह्मण‘ होने की सजा मिल रही है या फिर भाजपा अब इस पारंपरिक वोट बैंक को ‘ग्रांटेड‘ (गृहीत) मान चुकी है?
2. ‘चापलूस‘ तंत्र और अधिकारियों का मकड़जाल
आरोप लग रहे हैं कि सरकार अब उन चेहरों को आगे बढ़ा रही है जो केवल ‘जी–हुज़ूरी‘ में माहिर हैं। समाज के भीतर यह गुस्सा पनप रहा है कि कुछ ऐसे ‘बिकाऊ‘ ब्राह्मण नेता और अधिकारी तंत्र में फिट कर दिए गए हैं, जो अपने ही समाज के हितों की बलि चढ़ाने से नहीं चूकते। क्या भाजपा अब वास्तविक जननेताओं के बजाय ‘रबर स्टैंप‘ ब्राह्मणों के सहारे समाज को साधने का भ्रम पाल रही है?
3. क्या केवल ‘यूज एंड थ्रो‘ की राजनीति?
दशकों तक जनसंघ और भाजपा की रीढ़ रहा ब्राह्मण समाज अब ठगा हुआ महसूस कर रहा है। विंध्य की धरती हो या चंबल के बीहड़, सवाल एक ही है— क्या भाजपा ने ब्राह्मणों को सिर्फ दरबारी और वोट बैंक तक सीमित कर दिया है? सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे चेहरों में ब्राह्मणों की घटती भागीदारी इस ‘तेजाबी‘ सवाल को और हवा दे रही है।
4. ‘रौद्र रूप‘ की आहट: अगर ब्राह्मण जागा तो…
इतिहास गवाह है कि सत्ता की चाबी अक्सर उसी के पास रही है जिसे इस समाज का आशीर्वाद मिला। अगर वास्तविक ब्राह्मण नेतृत्व को कुचलने की कोशिश जारी रही, तो क्या आने वाले समय में भाजपा को ब्राह्मणों के ‘रौद्र रूप‘ का सामना करना पड़ेगा? आक्रोशित समाज अब ‘अपनों‘ की पहचान कर रहा है— वे कौन हैं जो समाज के नाम पर मलाई खा रहे हैं और वे कौन हैं जो वाकई समाज की लड़ाई लड़ रहे हैं।
लोकतंत्र में चेहरों को मिटाया जा सकता है, लेकिन जनाधार को नहीं। यदि मोहन सरकार और संगठन ने समय रहते ब्राह्मणों की इस ‘चुप्पी‘ और ‘पीड़ा‘ को नहीं समझा, तो यह राजनीतिक समीकरणों के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।







