ब्रांड वाणी विशेष: महंगाई का ‘मास्टर स्ट्रोक’ या जनता की कमर तोड़ प्रहार?

60 रुपये घरेलू और 115 रुपये कमर्शियल गैस महंगी; क्या ‘राम भरोसे’ चल रही है मोदी सरकार?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता देश की 140 करोड़ जनता पर एक बार फिर महंगाई का ‘एटम बम’ फोड़ा गया है। सरकार ने एक झटके में घरेलू गैस के दाम ₹60 और कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में ₹115 का इजाफा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या यह ‘युद्ध’ के बहाने जनता को लूटने की सोची-समझी रणनीति है या फिर सरकार के पास बढ़ती महंगाई को रोकने का कोई रोडमैप ही नहीं बचा है?

आडंबरों की ओट में सिसकती जनता

सोशल मीडिया पर ‘विश्वगुरु’ और ‘मजबूत भारत’ के विज्ञापन तैर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आम आदमी की थाली से दाल-रोटी भी छिनती जा रही है। एक तरफ भव्य आयोजन और उत्सवों का दौर है, तो दूसरी तरफ रसोई के बजट ने गृहणियों की आंखों में आंसू ला दिए हैं। क्या मोदी सरकार सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट और आडंबरों के सहारे चल रही है? जनता पूछ रही है—क्या यही ‘अच्छे दिन’ का असली चेहरा है?

क्या ‘मास्टर प्लान’ के नाम पर सिर्फ मास्टर-स्ट्रोक है?

लगातार बढ़ती कीमतें इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार के पास आर्थिक मोर्चे पर कोई ठोस योजना नहीं है। भ्रष्टाचार और महंगाई ने मिलकर आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। सरकार की चुप्पी यह संकेत देती है कि शायद अब देश को सिर्फ ‘राम भरोसे’ छोड़ दिया गया है।

“जब नीतियां फेल होती हैं, तो सरकारें राष्ट्रवाद और बाहरी संकटों का सहारा लेती हैं। गैस के दामों में यह भारी वृद्धि दर्शाती है कि सरकार की प्राथमिकता में आम नागरिक नहीं, बल्कि खजाना भरना है।”

प्रमुख सवाल जो सत्ता से पूछे जाने जरूरी हैं:

  • युद्ध का बहाना कब तक? क्या अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की आड़ में घरेलू उपभोक्ताओं का खून चूसना जायज है?
  • कहाँ है मास्टर प्लान? महंगाई और बेरोजगारी पर काबू पाने के लिए सरकार के पास कोई विजन है या सिर्फ नारों की सरकार है?
  • भ्रष्टाचार पर लगाम क्यों नहीं? जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार चरम पर है, क्या सरकार का नियंत्रण प्रशासन से पूरी तरह खत्म हो चुका है?

जनता के हित में कड़वा सच

सत्ता के गलियारों में बैठे लोग शायद भूल गए हैं कि इसी जनता ने उन्हें सिंहासन सौंपा था। अगर समय रहते महंगाई के इस ‘दानव’ को नहीं रोका गया, तो आडंबरों की यह चमक फीकी पड़ते देर नहीं लगेगी। लोकतंत्र में सरकारें जनता के कल्याण के लिए होती हैं, न कि उन्हें आर्थिक बोझ तले दबाने के लिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब ‘चुनावी मोड’ से बाहर निकलकर ‘सॉल्यूशन मोड’ में आना होगा, वरना इतिहास इसे केवल ‘जुमलों की सरकार’ के रूप में याद रखेगा।

  • Gaurav Singh

    Gaurav Singh

    Related Posts

    उज्जैन में 3-5 अप्रैल 2026 को होगा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ – मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री मोहन यादव भी होंगे शामिल

    उज्जैन, मध्यप्रदेश — उज्जैन में अप्रैल 2026 के पहले सप्ताह में एक ऐतिहासिक आयोजन होने जा…

    आगे पढ़ें
    ₹20,000 करोड़ MFI क्रेडिट गारंटी योजना का असर: NBFC-MFI सेक्टर को राहत या सीमित फायदा?

    भारत सरकार द्वारा शुरू की गई ₹20,000 करोड़ की माइक्रोफाइनेंस क्रेडिट गारंटी योजना (MFI Credit Guarantee…

    आगे पढ़ें

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    उज्जैन में 3-5 अप्रैल 2026 को होगा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ – मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री मोहन यादव भी होंगे शामिल

    उज्जैन में 3-5 अप्रैल 2026 को होगा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ – मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री मोहन यादव भी होंगे शामिल

    ₹20,000 करोड़ MFI क्रेडिट गारंटी योजना का असर: NBFC-MFI सेक्टर को राहत या सीमित फायदा?

    ₹20,000 करोड़ MFI क्रेडिट गारंटी योजना का असर: NBFC-MFI सेक्टर को राहत या सीमित फायदा?

    बंगाल का रण और चुनाव आयोग के फैसले: क्या अधिकारियों के तबादले तय करेंगे सत्ता का भविष्य?

    बंगाल का रण और चुनाव आयोग के फैसले: क्या अधिकारियों के तबादले तय करेंगे सत्ता का भविष्य?

    राजनीति के ‘शिखर’ और जनसेवा के ‘पर्याय’: क्या अपनों की ही घेराबंदी का शिकार हो रहे हैं जननायक संजय पाठक?

    राजनीति के ‘शिखर’ और जनसेवा के ‘पर्याय’: क्या अपनों की ही घेराबंदी का शिकार हो रहे हैं जननायक संजय पाठक?

    ‘मुखिया’ की पसंद भी ठुकराई, ADG साहब की नज़र अब दिल्ली के दरबार पर

    ‘मुखिया’ की पसंद भी ठुकराई, ADG साहब की नज़र अब दिल्ली के दरबार पर