
ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच डेनमार्क अपनी ही 50 साल पुरानी दलील में उलझता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अतीत में डेनमार्क ने ग्रीनलैंड की सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर जो तर्क दिए थे, वही आज उसके लिए मुश्किल का कारण बन गए हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि अगर अमेरिका कोई आक्रामक कदम उठाता है, तो NATO की भूमिका सीमित रह सकती है।
जानकारों के मुताबिक, डेनमार्क ने पहले यह तर्क दिया था कि ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का सैन्य या रणनीतिक फैसला उसकी सहमति और नियंत्रण में होगा। इसी दलील के आधार पर वर्षों तक ग्रीनलैंड की सुरक्षा व्यवस्था को परिभाषित किया गया। अब जब अमेरिका वहां अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है, तो डेनमार्क के लिए उसी तर्क के सहारे कड़ा विरोध करना आसान नहीं रह गया है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल NATO की भूमिका को लेकर है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड में कोई एकतरफा कदम उठाता है, तो NATO इसे सीधे तौर पर सामूहिक रक्षा का मामला नहीं मानेगा। इससे डेनमार्क की रणनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है और उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेले ही कूटनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह स्थिति डेनमार्क के पुराने फैसलों और कूटनीतिक रणनीति का नतीजा है। ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक क्षेत्र को लेकर वर्षों पहले अपनाई गई नीति अब बदलते वैश्विक समीकरणों के सामने टिक नहीं पा रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा न सिर्फ डेनमार्क की विदेश नीति, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र की शक्ति संतुलन राजनीति को भी नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।









