
भारतीय एविएशन सेक्टर में इंडिगो की बढ़ती बाजार हिस्सेदारी को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि घरेलू विमानन बाजार में एक ही कंपनी का अत्यधिक दबदबा Monopoly जैसी स्थिति पैदा कर रहा है, जिसका असर केवल प्रतिस्पर्धा पर ही नहीं, बल्कि यात्रियों और पूरी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इंडिगो की लगभग 65% मार्केट हिस्सेदारी और रोजाना हजारों उड़ानों का संचालन इसे अभूतपूर्व ताकत देता है, लेकिन इसी ताकत के गलत इस्तेमाल की आशंका भी गहराती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति सिर्फ एविएशन तक सीमित नहीं है। एयरपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर, टेलीकॉम और रिफाइनिंग सेक्टर में भी कुछ चुनिंदा कंपनियों का वर्चस्व देखने को मिल रहा है। इससे नए खिलाड़ियों के लिए बाजार में प्रवेश मुश्किल हो जाता है और कीमतों, सेवाओं व नवाचार पर नकारात्मक असर पड़ता है। एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि जब प्रतिस्पर्धा कमजोर होती है, तो उपभोक्ता विकल्प घटते हैं और सिस्टम किसी एक कंपनी पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि समय रहते मोनोपॉली प्रवृत्तियों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका दीर्घकालिक असर निवेश, रोजगार और उपभोक्ता हितों पर पड़ सकता है। वे नियामक संस्थाओं से मांग कर रहे हैं कि एंटी-ट्रस्ट नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि बाजार में संतुलन बना रहे। इंडिगो संकट पर उठी यह बहस अब एक बड़े सवाल में बदल गई है—क्या भारत की अर्थव्यवस्था कुछ गिने-चुने कॉरपोरेट समूहों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है?

