
ब्रांडवाणी डेस्क: मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों ‘बड़े साहब’ के बदले हुए व्यवहार की ही चर्चा है. अपनी सख्त कार्यशैली और ‘नो कॉम्प्रोमाइज’ एटीट्यूड के लिए मशहूर इन अधिकारी के व्यवहार में अचानक आई कोमलता ने सबको हैरान कर दिया है. विशेषज्ञ इस बदलाव को अनुभव का परिपक्व असर मान रहे हैं या इसे भविष्य की किसी नई रणनीति का संकेत कह रहे हैं. वल्लभ भवन से लेकर जिला कलेक्टोरेट तक, हर तरफ इसी की खुसर-पुसर है.
बदलाव की पृष्ठभूमि
एक समय था जब दिल्ली से आने वाले किसी भी आदेश को ‘बड़े साहब’ पत्थर की लकीर मानते थे। खासकर चुनाव ड्यूटी जैसे संवेदनशील मामलों में कोई ढील की गुंजाइश नहीं होती थी। जूनियर अधिकारियों की लाख मिन्नतों के बावजूद भी साहब का दिल नहीं पसीजता था।
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हालिया ही का घटनाक्रम
हालिया घटनाओं ने सबको चौंका दिया है। जब कुछ अधिकारी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं लेकर साहब के पास पहुंचे, तो न केवल उनकी बात ध्यान से सुनी गई, बल्कि समाधान भी तुरंत निकाला गया। खबर है कि चुनाव ड्यूटी निरस्त कराने के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग को बकायदा पत्र भेजा गया, जिसे आयोग ने स्वीकार किया।
बदलाव के संभावित कारण
- क्या यह बदलते राजनीतिक माहौल को भांपने की कोशिश है?
- या फिर साहब अपनी ‘स्ट्रिक्ट ऑफिसर’ वाली छवि को बदलकर एक ‘मेंटर’ के रूप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं?
क्या यह बदलाव स्थायी होगा?
देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘नरम मिजाज’ केवल चुनावी मौसम तक सीमित रहता है या फिर मध्य प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में एक नई कार्य-संस्कृति की शुरुआत है।
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