
मोदी सरकार मनरेगा (MGNREGA) को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। संसद के भीतर संकेत मिले हैं कि सरकार नया विधेयक लाने की योजना बना रही है, जिससे 2005 में शुरू हुई इस रोजगार गारंटी योजना का मौजूदा स्वरूप बदल सकता है या इसे चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्तावित बिल की कॉपी सांसदों को बांटी जा चुकी है, जिससे सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है।
मनरेगा योजना की शुरुआत 2005 में यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में हर परिवार को साल में 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित करना था। वर्षों में यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मजदूरों की आय और संकट के समय सामाजिक सुरक्षा का बड़ा आधार बनी। लेकिन मौजूदा सरकार का तर्क है कि अब नई रोजगार और कौशल योजनाओं के चलते मनरेगा की प्रासंगिकता कम हो गई है और इसकी जगह अधिक लक्ष्य आधारित स्कीम लाई जानी चाहिए।
विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मनरेगा को खत्म करना गरीब और ग्रामीण मजदूरों पर सीधा हमला होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार इस बिल को आगे बढ़ाती है तो संसद से सड़क तक बड़ा विरोध देखने को मिल सकता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा ग्रामीण वोट बैंक और आर्थिक नीति के लिहाज से बेहद अहम बन सकता है।

