
भोपाल | एक्सक्लूसिव रिपोर्ट मध्य प्रदेश, जिसे ‘हृदय प्रदेश‘ कहा जाता है, आज निवेशकों के लिए “पसंदीदा डेस्टिनेशन” होने का दावा तो करता है, लेकिन इस चमक–धमक वाली हेडलाइंस के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। राज्य की टॉप ब्यूरोक्रेसी (Top Bureaucracy) और सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि यहाँ ‘Ease of Doing Business’ केवल रसूखदार पूंजीपतियों के लिए है, जबकि नए और क्रांतिकारी आइडियाज वाले स्टार्टअप्स (Startups) के लिए लालफीताशाही की दीवार खड़ी कर दी गई है।
बड़े सेठों के लिए ‘रेड कार्पेट‘, युवाओं के लिए ‘चेक पोस्ट‘
ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS) के आंकड़ों पर गौर करें तो अरबों–खरबों के एमओयू (MoU) साइन होते हैं। लेकिन ये निवेश किनका है? रिलायंस, अडानी और बिड़ला जैसे बड़े घरानों के लिए सरकार की मशीनरी पलक–पावड़े बिछाए खड़ी रहती है। वहीं, जब इंदौर या भोपाल का कोई युवा अपना स्टार्टअप लेकर सरकारी दफ्तरों की चौखट पर पहुंचता है, तो उसे नियमों के मकड़जाल में उलझा दिया जाता है।
ब्यूरोक्रेसी की ‘नोज–रिंग‘: क्यों नहीं पनप पा रहे नए यूनिकॉर्न?
मध्य प्रदेश की नौकरशाही में बैठे कुछ “शक्तिशाली” अधिकारी कथित तौर पर वही फाइलें आगे बढ़ाते हैं जिनमें बड़े कॉर्पोरेट घरानों का हित छिपा होता है। जानकारों का कहना है कि:
● फंडिंग का अभाव: स्टार्टअप्स के लिए घोषित फंड्स अक्सर कागजों तक सीमित रहते हैं।
● पॉलिसी का भेदभाव: नीतियां इस तरह ड्राफ्ट की जाती हैं कि छोटे खिलाड़ी पात्रता की रेस से बाहर हो जाएं।
● वर्चस्व की लड़ाई: सत्ता के गलियारों में बैठे दिग्गज नेता नहीं चाहते कि कोई ‘बाहरी‘ या ‘नया‘ खिलाड़ी बाजार के समीकरण बिगाड़े।
BJP सरकार की मंशा पर सवाल: क्या केवल वोट बैंक है स्टार्टअप?
प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली से ‘स्टार्टअप इंडिया‘ का नारा बुलंद करते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में बीजेपी के बड़े नेताओं का रुझान “पूंजीवादी मॉडल” की ओर ज्यादा दिखता है। क्या यह महज इत्तेफाक है कि प्रदेश के बड़े प्रोजेक्ट्स केवल गिने–चुने उद्योगपतियों की झोली में जा रहे हैं? युवाओं का आरोप है कि उन्हें केवल ‘इवेंट्स‘ में भीड़ बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि असली मलाई ‘बड़े खिलाड़ी‘ काट रहे हैं।

